कुमाऊनी लोक और लोक साहित्य-२

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कुमाऊनी लोक और लोक साहित्य-२

लेखक: ताराचंद्र त्रिपाठी

पढ़िए लेख का पहला भाग 
संसार के लोकसाहित्य का अधिकांश सामन्तवादी सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित है. लोकगीतों और लोक-कथाओं में आदिम समाज और पशुचारण युग के समाज के  चित्र भी  यत्र-तत्र विकीर्ण हैं पर लोक-गाथाएँ विशुद्ध रूप से  सामन्ती समाज में ही प्रतिफलित  हुई हैं.

सामन्तवाद  जैसे-जैसे क्षेत्र-विस्तार  में  संकीर्ण होता जाता है,  उसके अत्याचार, मुख्यतया  असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए साधनों की कमी के कारण तथा  अल्पांश में निरंकुशता, मानसिक विकृति  और आदर्शहीनता  के कारण भी बढ़ते चले जाते हैं. प्रजा सम्राटों की अपेक्षा  मांडलिक राजाओं के अत्याचारों से  अधिक पीडि़त रही है।  कायरता, आत्मगोपन की प्रवृत्ति, सामाजिक असुरक्षा की भावना, स्त्रियों पर तरह-तरह के बंधन, बाल विवाह, यहाँ तक कि  भारत के कतिपय भागों में प्रचलित रही सती प्रथा भी अतिचारी सामन्तवाद की देन हैं.  

कुमाऊनी  लोक साहित्य में भी  इन सामन्ती अत्याचारों  के उल्लेख प्रचुर  हैं.  असंख्य युद्ध, चाले (षडयंत्र), हाड़न्या्ल ,( जिसमें दंडित व्यक्ति का पाँव लकड़ी के कुंदे की फाँस के बीच में फँसा दिया जाता है,) दोषपूर्ण कर व्यवस्था,  निरंकुशता पूर्ण शोषण, अपहरण तथा स्वेच्छाचारिता   लोक-गाथाओं में  विशद रूप से वर्णित है. ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं कि जनता  को  अपना अनाज सामन्तों की चक्कियों में ही पिसवाना पड़ता था.   सामन्त सीधी नाली  से  अनाज लेते थे और उल्टी नाली से आटा वापस करते थे. प्रजा को बन्द पड़ी पनचक्की  का भी कर देना पड़ता था. युवा स्त्रियाँ बल पूर्वक  अपहृत कर सामन्ती हरमों में ले जायी जाती थीं. जंगलों में सूखी लकड़ी बीनने पर भी प्रतिबंध लगा दिया जाता था

हमारे अधिकतर लोकदेवता,  सामन्तों के अत्याचारों से पीड़ित या षडयंत्रों में मारे गये पूर्व पुरुष हैं. बहुत उदाहरणार्थ  भोलानाथ  चन्द वंश का ही एक राजकुमार था. वह सन्यासी हो गया था और बाद में राजा द्वारा ईर्ष्यवश मार डाला गया. बिनसर का पहलवान चरवाहा कल बिष्ट  राज दरवार के षडयंत्रों में मारा गया. डोटी का राजकुमार  गंगानाथ अल्मोड़ा की भाना जोश्याणी के साथ अपने अवैध संबंधों के कारण उसके पति द्वारा मार डाला गया.
    
कुछ ऐसे सामंत भी लोक देवताओं की श्रेणी में स्वीकार कर लिये गये हैं जिनके अत्याचारों की याद उनकी मृत्यु के बाद भी जनता के रौंगटे खड़े करती रही है  उदाहरण के लिए कत्यूरी नरेश वीर देव (ब्रह्मदेव) अत्यन्त क्रूर और अत्याचारी शासक था जो षडयंत्रों की शंका से  कहारों के कंधों में पालकी के डंडे गड़वा कर चलता था और उसका अन्त भी दर्द से कराहते कहारों द्वारा राजा की पालकी सहित पहाड़ से कूद पड़ने के कारण हुआ. जागरों में इन सामन्तों के  स्वेच्छाचार और अत्याचारों का दारुण वर्णन हुआ है.

वस्तुतः अत्याचार  से मारे गये और अत्याचारी शासकों के  प्रेत-योनिगत प्रतिशोध से रक्षा के लिए ही   जागरों का उद्भव हुआ. ये अत्याचारी शासक या पैक (मल्ल) सामान्य प्रेतों के लिए उतने ही भयावह माने जाते हैं जितने कि वे जीवित अवस्था में सामान्य जनता के लिए भयावह थे. जागर के आयोजन के समय लोक देवताओं के व्यक्तित्व का अभिनयात्मक आवेश धारण करने वाले व्यक्ति (डंगरिये ) में आवेश का अवतरण करने के लिए जागर-गायक (जगरिया) या दास (चारण) इन्हीं अत्याचारों का या उनके जीवन के वीरतापूर्ण संघर्षों   और यदा कदा की गयी उनकी क्रूरता  का भी वर्णन करता है।

सामन्ती  व्यवस्था प्रेतयोनिगत लोक-विश्वासों में भी प्रतिबिंबित हुई है. सामान्य प्रेतो का नायक भूमियाँ ( भूमिपाल) नाम का प्रेत है. इसकी तुलना ग्राम प्रधान से की जा सकती है. नदी के एक संगम से लेकर दूसरे संगम तक  का अधिपति मशान है. विवाह आदि के अवसर पर श्वसुरालय को जाती हुई बहू का परिछन कर चावल, उड़द और एक पैसा इसके नाम पर अर्पित करना अपरिहार्य माना जाता है. यह एक प्रकार से ग्राम-समूहों का स्वामी है। जंगलों का अधिपति तथा चारागाहों का स्वामी खबीश नाम का एक और प्रेत है. कहा जाता है कि वह अंधकाराच्छन्न  गिरि-गुहाओं में  निवास करता है और यदा-कदा चरवाहों की बोली बोलता हुआ यात्रियों का पीछा करता है. इन पदाधिकारियों के अतिरिक्त घुना तिरी दीवान ( सामन्त के घुटनों  के पास बैठने वाला दीवान या वैयक्तिक सहायक), रुसदी, मुसदी, दरी, दीवान, छत्री-बरदार,  आदि पदाधिकारी मी प्रेतयोनिगत विश्वासों में प्रतिबिंबित हुए हैं. 

लोक-देवताओं के आपसी संबंधों  में सामाजिक मर्यादा के प्रति बड़ी सजगता दिखायी देती है. भोलानाथ योगी होने और ग्वेल की अपेक्षा क्षेत्र विस्तार में कम होने के बावजूद, अपने पूजा-क्षेत्र में ग्वेल से भी अधिक प्रभावशाली  माना जाता है. गंगानाथ अपनी दुश्चरित्रता के कारण योगी भोलानाथ के सामने टिकने का साहस नहीं करता. देवी बहुत कम बोलती है. उसकी नृत्य-मुद्रा  भी अधिक शालीन होती है जबकि अन्य डंगरिये उद्धत नृत्य-मुद्रा में नाचते हुए मूल पुरुष के जीवन की घटनाओं का अभिनय करते हैं. 

प्राचीन राजनीतिक विभागों की छाया लोक देवताओं की मान्यता में मिलती है। अल्मोड़ा और उसके प्रवासियों का मुख्य देवता भोलानाथ है. चंपावत के प्राचीन राज्य क्षेत्र में ग्वेल की पूजा प्रचलित है. काली नदी क्षेत्र का अधिपति नङथर नामक देवता है. असकोट क्षेत्र में छुरमल, वेरीनाग क्षेत्र में  मूल नारायण, कत्यूर तथा पाली क्षेत्र  में कत्यूरी सामन्त  धामदेव और ब्रह्मदेव  प्रमुख देवता हैं.

सामन्ती व्यवस्था और सामाजिक संक्रमण का जैसा सुन्दर और जीवन्त अंकन लोक-साहित्य में मिलता है वैसा नागर साहित्य में नहीं मिलता. क्योंकि प्रत्येक असामान्य घटना की  जैसी सहज और त्वरित  प्रतिक्रिया लोक-मानस में होती है, उतनी सुविधाभोगी समाज में नहीं.  गाँवों  के दूर.दूर होने और मार्गों की बीहड़ता का प्रभाव यहाँ के लोक जीवन पर भी पड़ा है। कन्या विवाहोपरान्त अपने नैहर से दूर चली जाती है. श्वसुरालय में उसकी स्थिति प्रायः उस अवैतनिक कृषि मजदूर की है, जिसे दिन भर खेतों और जंगलों में  काम कर, घर लौटने पर पति की इच्छा और सास के इंगितों पर जीना पड़ता है। वह दिन भर खेतों और जंगलों में काम कर थकी हुई घर लौटती है, अभी उसे घर से दूर स्थित स्रोत  पानी  भी लाना ही होगा.  कभी- कभी  नवोढ़ा पत्नी को थका हुआ देख कर  पति  पसीज जाता है : (  ग्यूँ भट भुटि खूलो, तू पाणी नी जा।   मेरी  छैला  वे  तू  पाणि  नी  जा) .            

लोक साहित्य की सास और ननद बहू के लिए बड़ी समस्या हैं. कभी- कभी सास और ननद मिल कर बहू की हत्या भी कर देते हैं। इसीलिए लोकगीतों की बहू ननद को पड़ोस में न व्याहने का आग्रह करती है कि वह घर में जो भी देखेगी, उसे माँगने लगेगी और माँग पूरी न होने पर झगड़ा करने लगेगी ( जोइ-जोइ  सोइ सोइ माँगे, नित उठि करे हमसौं झगड़ा) तो  दूसरी ओर कतिपय अन्य गीतों में भाभी द्वारा गरीब घर में विवाहित ननद की उपेक्षा की करुण कथाएँ भी मिलती है  पति और पत्नी के बीच क्रमशः अपनी भांजी और बहिन के विवाह में दायज भेजने की प्रतिस्पर्द्धा का भी मार्मिक  वर्णन मिलता है.  लेकिन लोकमानस  इस पर चुप नहीं रहता. प्रायः ऐसे सभी प्रसंगों के अन्त में, दोषी व्यक्ति की  जीभ काट कर आत्महत्या े अंकित करता है। कहीं-कहीं उत्पीडि़त व्यक्ति भी आत्म हत्या करते हुए दिखाई देते हैं यथा ‘जूँ हो’  शीर्षक कफुवा पक्षी से संबंधित लोक कथा में  बहू सास से बार.बार अपने मायके जाने की अनुमति माँगती है पर हर बार सास बहाने बना देती है। मायके की याद के असह्य हो जाने पर  बहू मर जाती है। इसी तरह ‘भै भूखो मैं सीती’ शीर्षक गीत में घुघुता पक्षी से संबंधित लोक-कथा में अपने घर में आये भाई के प्रति बहिन की निष्ठुरता और भाई के रात भर भूखे रह जाने और मर जाने पर  पश्चाताप के कारण स्वयं भी मर जाने वाली बहिन की कथा अंकित है.  

सामाजिक जीवन के साथ-साथ पारिवारिक संबंधों में आ रहे परिवर्तन के प्रतिबिंब भी लोक-साहित्य में मुखरित हुए हैं. इसका सबसे अच्छा उदाहरण ‘मालू काटण दे’ शीर्षक गीत है।  एक सौ पचास वर्ष पहले इस गीत में मालू काटने पर  मासूल (अर्थ दंड) पड़ने,  दौंण (गोठ) में  नौ सेरिया (नौ सेर दूध देने वा्ली) भैंस के होने,  डाले ( पालने में शिशु के रोने की चिन्ता), खयाँरी ( तंग करने वाली) सास की उपस्थिति के अंकन के साथ ही उसकी स्थिति दयार्द्र हो कर पतरौल द्वारा  मालू काट ले जाने की अनुमति  देने का अंकित हुआ है तो आज  इस गीत में नयी ब्यायी हुई भैंस और उसकी नवजात थोरी (मादा) तो है पर पालने में रोता हुआ बच्चा और दुष्ट स्वभाव वाली सास  और  नायिका की परिस्थिति से  दयार्द्र होने वाला पतरौल सब खो गये हैं. पतरौल तो  ठेठ सरकारी कर्मचारी है. कह देता है कि तू अपनी भैंस को  पहाड़ से घुर्या  (लुढ़्का दे).  पर मैं तुझे मालू  नहीं काटने दूंगा. वह तभी मालू काटने की अनुमति देता है जब उसे पता लगता है कि यह तो मेरी साली है.

संसार के लगभग सभी पर्वतीय भू-भागों में आजीविका के साधनों अत्यन्त श्रम साध्य होने, आवागमन के साधनों के अभाव और दुर्गम मार्गों के कारण विभिन्न अंचलों के बीच  बोलीगत और सांस्कृतिक वैविध्य के साथ-साथ लोक-मानस  जिस संदेह, अविश्वास, अनिश्चितता और अभावग्रस्त जीवन को प्रतिबिम्बित करता है,  हमारा लोक साहित्य उसी का प्रतिबिम्ब है.   उसमें  हमारा वह अतीत प्रतिबिम्बित है जो प्राय:  अकाल से पीड़ित होता था.  अन्न के आभाव में पनचक्कियाँ  बन्द ( घट घालो घेरा.  चड़ी को सो गावो दिये अबेरा सबेरा) लोग जंगली कन्द मूल, फलों के सहारे किसी तरह जीवन- यापन करते थे.   ऐसे में यदि पाहुने भी पधार गये तो? (  फल टिपि खाया. अकाला का दिन यसा, पौण घर आया)   ऐसे में   अच्छे भोजन का प्रलोभन,   किसी को भी सामाजिक मर्यादाओं  के बन्धनों की परवाह न करने के लिए प्रेरित करता ही होगा. 
(ना्न भौ घुरुवा.  सेती ग्यूँ की रोटि खाली, माछो को सुरुवा। )

नायक  का अर्थोपार्जन के लिए परदेश गमन, वहाँ से नायक का वर्षों बाद घर लौटना,  मार्ग में प्रतीक्षा करती हुई नायिका द्वारा न पहचाना जाना अथवा  नायिका का विवाह अन्यत्र कर दिया जाना  या सौतेली माता के द्वारा नायिका की हत्या आदि के मार्मिक वर्णन  लोक गीतों में यत्र तत्र विकीर्ण हैं.                        

युग बदला तो लोकगीतों के स्वर भी बदल गये.  सास का डर कम हो गया.  मैं सोलह शृंगार अवश्य करूंगी चाहे सास कुछ भी करे ( मैं करुलो सोलह सिंगार चाहे सासू कसै करौ ). हाथ छ पोथी काँख छ धोती वाले बरज्यू (दूल्हा)  एफ0ए0, बी0ए0 का पढ़ा हुआ है, कालेज पढ़ने को जा रहा है.  माता-पिता की लाड़ली बन्नी  अब नव युग की प्रतिमा बन चुकी है. पिता को पैदल और  पुत्र को घोड़े पर आता हुआ देख कर ‘विपरीत चाल’  से रुष्ट हो जाने वाले  वैश्वानर देव अब अतीत में खो गये हैं.  बेटे की बहू के रसोई करने और  भांजे की बहू के काज परोसने  से संबंधित  गीत भी अब नहीं सुनाई देते. संयुक्त परिवार की भावना जिसमें सात पीढि़यों तक के जीवित बांधवो के अवस्था क्रम में घर होने का उल्लेख होता था, अब यदा-कदा ही सुनाई देते हैं. इन पुराने गीतों का स्थान अब फिल्मी धुनों पर आधारित नये गीत लेते जा रहे हैं.  खेतों और जंगलों में काम करने वाला  पशुचारक प्रेमी जो कल तक अपनी प्रेमिका के लिए गोला और मिश्री  लेकर प्रतीक्षा करता था, अब हरा कुर्ता और लाल बनियान पहन कर दिल्ली से घर आ रहा है.  प्रेमिका भी कब से  हरे घाघरे के स्थान पर रेशमी साड़ी की माँग करने लगी है. नयी सभ्यता और विकास योजनाओं  के प्रति  लोक-मानस सजग है. जहाँ  कल तक बन्दर और लंगूर उछलते-कूदते थे, वहाँ आज कारें दौड़़ रही हैं।  (जाँ धिरकँछिया गुणि बानर, वाँ धिरकणी कार)

विकास योजनाओं में प्रशासनिक दुर्व्यवस्था उनसे छिपी नहीं है (1954 में वन विभाग द्वारा अल्मोड़ा जनपद में मछखाली-ऐड़ादेव मोटर मार्ग के निर्माण के बारे में  उन दिनों प्रचलित निम्नलिखित लोकगीत  ( ताला टुका जोगी नाई ठेकेदार।  माला टुका गुसैं शिल्पकार।  बीच-बीच गैगनैं की मार. छै छन कुली नौ छन जमादार) लोक-मानस की जीवन्त प्रतिक्रिया की  सहज  अभिव्यक्ति है

व्यापारी वर्ग के प्रति लोक-मानस विशेष रूप से व्यंग्यात्मक है. सामान्य जनता ने  प्राय: व्यापारी वर्ग से उनके द्वारा किये जाने वाले आर्थिक शोषण का बदला इसी उपहास वृत्ति के द्वारा लिया है।  यह प्रवृत्ति संसार के सभी लोक-साहित्यों में विद्यमान है। व्यापारी वर्ग की महिलाओं के सौन्दर्य  के प्रति भी  आकर्षण इन गीतों किस्सों और लोकोक्तियों में दिखायी देता है। एक क्रीड़ा गीत में तो  वणिक कन्या से विवाह करना चुनौती के रूप में अंकित है. 
(आँस काटँ बाँस काटूँ खेत करूँ मैदान. जब मैं बणिये कि चेलि ल्यूँ तब मैं पधान।

लोक-साहित्य चूँकि श्रमजीवी जनत की थाती है, अत: उसमें गरीबों के प्रति सहानुभूति और सहृदयता सर्वत्र व्याप्त है. उदाहरण के लिए पांडवों का जाल काटने के लिए ‘कइया लोहार’  भीमसेन से दस हजार रुपया माँगता है और भाव-ताव करते-करते  एक रुपये तक आ जाता है। इस पर भीमसेन  कइया लोहार से कहते हैं कि वे तो उसे एक रुपया भी दे देंगे पर गरीब क्या करेंगे?  इसलिए उसे जाल काटने के बदले एक पैसा लेना चाहिए। राम-विवाह के अवसर पर  जनकपुर में विवाह मंडप के लिए सोने के खंभे लगाने की व्यवस्था होती है। पर राम कहते हैं कि वे तो सोने के खंभे लगा लेंगे पर गरीब क्या करेंगे? इसलिए केले के खंभे लगायें.  दूसरी ओर जन सामान्य की गरीबी के कारण लोक गीतों में  सामूहिक भोज की कल्पना में छत्तीस ज्योनार और बत्तीस पकवान बनते ही हैं। सोने की थालियों में भोजन और चाँदी की झारी में गंगाजल परोसा ही जाता है।

लोकगीतों की लय और लोकनृत्यों की अंग भंगिमा में दैनिक कार्य व्यापार की प्रतिच्छाया  झलकती है।  गोलाकार झोड़ा नृत्य का पद संचालन, तीन कदम आगे और एक कदम पीछे, अनाज माड़ने की क्रिया का लयात्मक रूप  लगता है। छपेली में आदिम काम स्वातंत्र्य की छाया मिलती है। छोलिया नृत्य सामन्ती युद्धों की कलात्मक अनुकृति है। पिथौरागढ़ अचंल के कुमौड़ा ग्राम में  प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला  पारंपरिक ‘हिलजात्र’ कृषि-परक नृत्य नाटिका   है जिसमें  नर्तक कृषि के विभिन्न साधकों  का रूप धारण कर नृत्य करते हैं।

हमारे  लोक-साहित्य में छत्तीस, बत्तीस, बाईस, सात आदि संख्यात्मक प्रतीक (मोटिफ)  महत्वपूर्ण हैं. जैसे छत्तीस रकम, बत्तीस कलम, छत्तीस रौतान, बत्तीस पैरुणी, छत्तीस ज्योनार, बत्तीस पकवान, आदि . युद्धभूमि बाईस हाथ, उसमें डाला जाने वाला रीठा बाईस मन, लंगर बाईस हाथ, बफौल बाईस भाई और रमौल सात. लोक देवताओं का जागर भी या तो सात दिन तक आयोजित किया जाता है या बाईस दिन तक. यही नहीं   मशान कलुवा या लटुवा ही होगा. बहू दूधकेला ही होगी. खाँडा दरवाणी ही होगा। ढाल गैंडासुरी ही होगी. घोड़े की जीन सुनहरी ही होगी. चाबुक भौंरिया ...।(चकरी लगा कर चोट करने वाला) ही होगा.
विभिन्न जातियों के बीच संघर्षों की छाया भी यदा-कदा भूतों की कल्पना में प्रतिबिंबित हुई है.  भूतों के पावों में  आगे से मुड़े हुए राजशाही जूते , तुर्क आक्रमण के प्रतीक हैं. भूतों की आकृति कुछ-कुछ लामाओं से मिलती-जुलती है.  रंग और शरीर रचना में  वे एकदम काले आदिवासियों से मिलते-जुलते हैं, और तो और दारमा की ’चुड़ैल  भी निचले क्षेत्रों के लोगों की बोली में बोलती है:
(क्वातम्स्या बूगे क्वर्ता, (चुड़ैल ने कहा) (दारमा की बोली)      
बद्या बद्या एक हाङा म ले द्ये (गंगोली की बोली)                

निष्कर्ष यह है कि किसी भी अंचल के लोक-गीतों, लोक-कथाओं, लोक-गाथाओं आदि में संस्कृति का लोक कल्पना से आवृत प्रामाणिक विवरण प्रतिबिंबित होता है। आवश्यकता इस बात की है कि उन सारी कथाओं और गाथाओं से लोक प्रवृत्ति-मूलक अंशों और गायक की अपनी बात को अलग करते हुए अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशस्तियों, वर्णन विस्तार की प्रवृत्ति और तक मिलाने के कारण जड़राई के जाजड़राई, झालराई के हालराई जैसे वंश-वृक्ष का प्रखर विश्लेषण किया जाय. पर इस प्रकार की सामग्री के विश्लेषण के लिए अध्येता में वैज्ञानिक की सी तटस्थता अपरिहार्य हैं. अन्यथा हम अपने अपने क्षेत्र के इतिहास को महिमा-मंडित करने की पुनर्जागराणत्मक प्रवृत्ति से ग्रस्त होकर अपने क्षेत्र के इतिहास पर एक और परदा डालने के दोषी होंगे।

ताराचंद्र त्रिपाठी,  एल  मुरादबाद, 11-09-2016

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