
कुमाऊँ के लोक देवता - भ्वालनाथ, या भोलानाथ
लेखक- दुर्गा दत्त जोशीकुमाऊं के लोक देवता, इनकी स्त्री को बर्मी कुछ बामणी मानते हैं। अंग्रेज लेखक अठकिंसन बड़ीनि लिखते हैं। कुछ लोग भ्वालनाथ को शिव का अंश और इनकी पत्नी बर्मी को सती का अंश भी मानते हैं।
इनकी उत्पत्ति की कहानी इस तरह है, कहते हैं राजा बाजबहादुर चंद के पुत्र उद्योतचंद की दो रानियां थीं दोनों के एक एक पुत्र हुआ। जब दोनों बड़े हुए बड़ा राजकुमार बुरी संगत में पड़ने से राज्य से निकाला गया। छोटा राजकुमार ग्यानचंद के नाम से गद्दी पर बैठा।
थोड़े दिनों बाद बड़ा राजकुमार साधु के भेष में अल्मोड़ा आकर नैलपोखर में ठहरा। वह पहचाना गया और राजा ग्यानचंद ने यह सोचकर कि कहीं गद्दी न छीन ले इस डर से उसे एक बड़िया यानी माली द्वारा उसको मय उसकी गर्भवती स्त्री के मरवा दिया। उस साधुवेश धारी राजकुमार की स्त्री ब्राह्मणी थी उससे उन्होंने नियोग कर लिया था। मृत्यु के बाद वह भोलानाथ के नाम से भूत बन गया और उसकी स्त्री भूतनी उसके पेट का बच्चा भी भूत बन गया। ए भूत अल्मोड़ा के लोगों को सताने लगे ज्यादातर बड़िया माली जाती के लोगों को। भूत से बचने के लिए भूत शांति के निमित्त तब अल्मोड़ा में आठ भैरव मंदिरों का निर्माण हुआ। आठ भैरव मंदिर इस प्रकार हैं, 1काल भैरव 2 बटुक भैरव, 3 बाल भैरव 4 शै भैरव 5 गढ़ी भैरव 6 आनंद भैरव 7 गौर भैरव 8 खुटकौंनिया भैरव।
यहां एक और कहानी भी प्रचलित है कि कोई फकीर अल्मोडा राजा के महल में आया। राजा का कमरा बंद था वह योगबल से दरवाजा खोलकर राजा के पास पहुंच गया। राजा रानी के साथ था यह देखकर राजा को गुस्सा आया उसने फकीर को मारडाला। फकीर की हत्या के बाद राजा सो नहीं सका जब भी वह पलंग पर सोता भूत उसे जमीन में पटक देता। अंततः राजा ने वह सयनकक्ष छोड़ा और भूत की चर्चा दरबारियों से की। तब राजा ने पंडितों की सलाह पर आठ भैरव मंदिर बनाए।
अठकिंसन कहते हैं , "भैरव मंदिरों को चढ़ाई गई गूंठें अंग्रेजी हकूमत ने छीन लीं और भैरव मंदिरों में पूजापाठ बंद हो गया। तब भोलानाथ के भूत ने अंग्रेजों के तंबुओं में पत्थर बरसाने शुरू किए। इससे अंग्रेज भयभीत हुए और उन्होंने पूजा पाठ का यथोचित प्रबंध किया तब शांति हुई।
कहानी ..कुमाऊं का इतिहास सेचित्र साभार

दुर्गा दत्त जोशी
दुर्गा दत्त जोशी जी द्वारा फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी शब्द सम्पदा से साभार
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