'

उत्तराखंड में कुमाऊँ की आलेखन परम्परा-2

कुमाऊँ की आलेखन परम्परा में चावल के आटे के घोल से सीधे ऐपणों का आलेखन करते हैं।   There different forms of fol art in  Kumaon, like on paper, on floor and on clothes

उत्तराखंड में कुमाऊँ की आलेखन परम्परा-2

साहों व ब्राह्मणों के ऐपणों में अन्तर के बारे में जैसे देखें तो एक अंतर यह है कि ब्राह्मण गेरु मिट्टी से धरातल का आलेपन कर चावल के आटे के घोल (जिसे स्थानीय भाषा में बिस्वार कहते हैं) से सीधे ऐपणों का आलेखन करते हैं।  परन्तु साहों के यहाँ चावल की बिस्वार के घोल में हल्दी डालकर उसे हल्का पीला अवश्य किया जाता है तभी ऐपणों का आलेखन होता है।  ज्ञात हुआ कि उच्चकुलीन ब्राह्मणों में जो दीवानों की कोटि में आते हैं, उनकी परंपरा में भी 'बिस्वार' में कच्ची अथवा सूखी हल्दी पीस कर डाल दी जाती है और पीली आभा युक्त ऐपण दिये जाते हैं। 

साहों के यहाँ ऐपणों के अन्तर्गत एक और विशेष शैली है, जिसे 'वर' कहा जाता है। क्योंकि इसमें बूँदों तथा उनकी सँख्या द्वारा समान रुप से वरों व डिज़ाईनों का निर्माण किया जाता है।  हर डिजाइन व अभिप्राय के लिए बूंदों की अलग-अलग संख्या निर्धारित है।  प्रत्येक आलेखन विशेष ज्योमितीय अलंकरण, बूंदों की संख्या, विशेष रंग द्वारी निर्धारित व नामांकित है।  पट्टे पर वर बूंद मुख्यत: उपासना या पारिवारिक पूजा गृह में ही सुशोभित रहते हैं।  पर बूंदों का चित्रांकन पूजा गृह के अतिरिक्त भी दृष्टिगोचर होता है।  यदि उनके निर्माण का कारण जाना जाय तो शत प्रतिशत यह तथ्य उजागर होता है कि अमुक समय में विवाह या यज्ञोपवीत संस्कार उस स्थान पर हुआ था, इसलिए वहाँ वरों का निर्माण हुआ था।

थापा पट्टा शैली, ज्यूति मातृका इत्यादि शैलियाँ चम्पावत या संलग्न क्षेत्र में मात्र कुछ ब्राह्मण अथवा साह परिवारों के अतिरिक्त कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होतीं।  अन्य इनका ज्ञान नहीं रखते।  इन शैलियों की विगत १०० वर्षों से सुरक्षित अनेक रचनाएँ आज भी अल्मोड़ा, रानीखेत में हैं।  इनका आलेखन आज भी उसी उत्साह व मान्यताओं के आधार पर होता है जो विगत शताब्दियों से था।  प्रयुक्त संकेतों, कोणों, बिन्दुओं, चित्रकृतियों व विभिन्न अनुष्ठानों के लिए विभिन्न संख्या को बिन्दुओं द्वारा निर्मित यंत्र चौकियों के देखने से स्पष्ट होता है कि कुमाऊँ की इस कला में वज्र यानी, शैव व शाक्त तांत्रिक अनुष्ठानों व मान्यताओं का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है।

रेखाचित्रों वाले पट्टों व ज्यूतियों में 'जैनशैली' जो अपनी प्रारम्भिक अवस्था में गुजरात में 'अपभ्रंश' शैली के रुप में विकसित व प्रतिष्ठित हुई थी, स्पष्ट रुप से दिखाई देती है।  इसके अतिरिक्त राजस्थानी शैली, जो कि अपभ्रंश शैली का ही विकसित रुप थी व विशेष रुप से 'मालवा शैली', जो राजस्थानी शैली की ही एक धारा है, से भी विकसित होकर उभरी।  इसका उदाहरण ज्यूति मात्रिका पट्टा, शेष शय्या (शेषनाग की शय्या पर विराजमान विष्णु व लक्ष्मी), महालक्ष्मी पट्टा, डोर दुबज्योड़ पट्टा, कृष्ण जन्माष्टमी पट्टा व नवदुर्गा पट्टा (नवरात्रि पूजन के समय) में दृष्टिगोचर होता है।

कुमाऊँ की ज्यूति मातृका पट्टों, थापों तथा वर बूदों में श्वेताम्बर जैन अपभ्रंश शैली का भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।  श्वेताम्बर जैन पोथियों की श्रृंखला में बड़ौदा के निकट एक जैन पुस्तकागार में ११६१ ई. की एक ही पुस्तक में औधनियुक्ति आदि सात ग्रंथ मिले, जिनमें १६ विद्या देवियों, सरस्वती, लक्ष्मी, अम्बिका, चक्र देवी तथआ यक्षों के २१ चित्र बने हैं।  इन ग्रंथ चित्रों में चौकोर स्थान बनाकर एक चौखट सी बनाई गई हैं और इनके मध्य में आकृतियाँ बिठाई गई हैं।  ठीक इसी प्रकार का चित्र नियोजन कुमाऊँ के समस्त ज्यूति पट्टो, थापों व बखूदों में किया जाता है।  कुमाऊँ में ज्यूति पट्टों में महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली ३ देवियाँ बनाई जाती है साथ में १६ षोडश मातृकाएं तथा गणेश, चन्द्र व सूर्य निर्मित किये जाते हैं।  अपभ्रंश शैली में रंग व उनकी संख्या भी निश्चित है।  जैसे लाल, हरा, पीला, काला, बैगनी, नीला व सफेद।  इन्हीं सात रंगों का प्रयोग कुमाऊँ की भिप्ति चित्राकृतियों अथवा थापों व पट्टों में किया जाता है।

कुमाऊँ की आलेखन के बारे में हम आगे के भागों में भी पढ़ते और जानते रहेंगे
( पिछला भाग-१ ) ...................................................................................................( कृमश: भाग-३ )

संदर्भ के लिए पढ़ें:
थपलियाल रेखा १९९१ प्राचीन मध्य हिमालय कुमाऊँ का इतिहास : सांस्कृतिक भूगोल : नृवंशीय अध्यया। नई दिल्ली; नॉर्दन बुक सेन्टर।
पाण्डे बद्रीदत्त १९९० कुमाऊँ का इतिहास। अल्मोड़ा; श्याम प्रकाशन श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
जोशी महेश्वर प्रसाद १९९४ उतराञ्चल हिमालय समाज, संस्कृति, इतिहास एवं पुरात्व। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
बालदिआ, के. एस. १९९८ कुमाऊँ (लैंड एण्ड प्यूपिल)। नैनीताल; ज्ञानोदय प्रकाशन।
नौटियाल शिवानन्द १९९८ कुमाऊँ दर्शन। लखनऊ; सुलभ प्रकाशन।
सक्सेना कौशल किशोर १९९४ कुमाऊँ कला, शिल्प और संस्कृति। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
वाजपेयी श्री कृष्णदत्त १९६२ उत्तर प्रदेश का सांस्कृतिक इतिहास। आगरा; शिवलाल अग्रवाल एण्ड कम्पनी (प्रा.) लि.।
पाठक शेखर १९९२ पहाड़ हिमालयी समाज, संस्कृति, इतिहास तथा पर्यावरण पर केंद्रित। डी. के फाईन आर्ट प्रेस।
वर्मा विमला १९८७ उत्तर प्रदेश की लोककला, भूमि और भिप्ति अलंकरण। दिल्ली; जय श्री प्रकाशन।
मठपाल यशोधर १९९७ उत्तराखण्ड का काष्ठशिल्प। देहरादून; शिवा आॅफसेट प्रेस।
अग्रवाल, डी.पी. एवं एम.पी. जोशी १९७८ "रॉक पेंटिंग इन कुमाऊँ"। मैन एण्ड इन्वायरनमेंट भा. क्ष्क्ष् इंडियन सोसायटी फॉर प्रीहिस्ट्री एण्ड क्वार्टनरी स्टडीज (अहमदाबाद)।
त्रिवेदी विपिन बिहारी १९८७ उत्तर प्रदेश साहित्य, संस्कृति एवं कला। नई दिल्ली; एस. चन्द एण्ड कम्पनी (प्रा.) लि.।
उप्रेती नाथूराम १९७७ कुमाऊँ की लोककला, कुमाऊँनी संस्कृति। रुद्रपुर; उपयोगी प्रकाशन।
एटकिन्सन, ईयटीय १९७३ द हिमालयन गजेटियर वा. क्ष् व क्ष्क्ष्। दिल्ली; कास्मो पब्लिकेशन।
कठोच यशवंत सिंह १९८१ सध्य हिमालय का पुरातत्व। लखनऊ; रोहिताश्व प्रिन्टर्स।
गरोला, टी.डी. १९३४ हिमालयन फोकलोर। इलाहाबाद।
जैन कमल कुमार १९८३ उत्तराखंड के देवलयों का परिक्षण। लखनऊ; ध्यानम पब्लिकेशन।
जोशी, एम.पी. १९९२ उत्तरांचल (कुमाऊँ - गढ़वाल हिमालय)। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
जोशी प्रयाग १९९० कुमाऊँनी लोक गाथायें : एक सास्कृतिक अध्ययन। बरेली; प्रकाश बुक डिपो।
डबराल शिव प्रसाद १९९० उत्तराखंड का इतिहास। गढ़वाल; वीर गाथा प्रकाशन।
पोखरिया देव सिंह १९८९ "कुमाऊँ के लोकनृत्य", उत्तराखंड भाग - ३। उत्तराखंड शोध संस्थान।
प्रसाद जगदीश्वरी १९८९ कुमाऊँ के देवालय। अल्मोड़ा; उत्तराखंड सेवा निधि ।
पांडे त्रिलोचन १९७७ कुमाऊँनी भाषा और उसका साहित्य। लखनऊ; उ.प्र. हिन्दी संस्थान।
फ्रैंगुअर, ए.सी. १९९० दि जागर : हिमालय पास्ट एण्ड प्रजेन्ट। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
बैराठी कृष्णा एवं सत्येन्द्र कुश १९९२ कुमाऊँ की लोक कला, संस्कृति और परम्परा। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
बाजरोयी कृष्णदत्त १९९० भारतीय वास्तुकला का इतिहास। लखनऊ; उ.प्र. हिन्दी संस्थान।
नौटियाल, के.पी. १९६९ आर्कीयौलॉजी आॅफ कुमाऊँ इन्कलूडिंग। वाराणसी; चौखम्बा संस्कृत सीरीज।
भ मदन चन्द्र १९८१ उत्तराखंड का "पुरातत्व विशेषांक"।
मठपाल यशोधर १९८७ उत्तराखंड की संस्कृति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उत्तराखंड वार्षिकी, उत्तराखंड शोध संस्थान।
वैष्णव यमुनादत्त १९८३ कुमाऊँ का इतिहास, "खस कस्साइट जाति के परिपेक्ष्य में"। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
पाण्डे, पी.सी. १९९० इथनोबौटनी आॅफ कुमाऊँ हिमालया, हिमालय इन्वायरनमेंट एण्ड डबलपमेट। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
सर्राफ, डी.एन. १९८२ एंडियन क्राफ्ट्स। दिल्ली; विकाल पब्लिकिंशग हाऊस, अनसारी रोड।
पाण्डे गिरिश चन्द्र १९७७ उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था। नैनीताल; कंसल पब्लिशर्स।
पालीवाल, नारायण दत्त १९८५ कुमाऊँनी - हिन्दी शब्दकोश। दिल्ली; तक्षशिला प्रकाशन।
पाण्डे, चारु चन्द्र १९८५ कुमाऊँनी कवि 'गोर्दा' का काव्य दर्शन। अल्मोड़ा; देशभक्त प्रेस।
वैष्णव शालिग्राम १९२३ उत्तराखण्ड रहस्य। नागपुर-चमोली; पुष्कराश्रम।
सांकृत्यायन राहुल १९५३ हिमालय परिचय। इलाहाबाद; लॉ जर्नल प्रेस।
सिंह वीर १९८९ खेती और पशु : पहाड़ी खेती के आधार। नैनीताल; संपादक व प्रकाशक पाठक।
जोशी, एम.पी. १९७४ सम रेअर स्कल्पचर्स फ्राम कुमाऊँ हिल्स संग्रहालय पुरातत्व पत्रिका।

यह लेख मौलिक नहीं है, इसका मुख्य आलेख इस लिंक से लिया गया है, आप यहाँ पर भी सम्पूर्ण लेख को पढ सकते हैं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ