
उत्तराखंड में कुमाऊँ की आलेखन परम्परा-5
अब उन चित्रांकनों का विवरण दिया जा रहा है जिनमें चावल पिष्ठिका घोल व गेरु का प्रयोग नहीं किया जाता वरन् विभिन्न रंगों - लाल, चटख लाल, हरा, पीला, नीला, बौजनी, काला व सफेद -को प्रयोग में लाया जाता है।
मुहाली, द्वार मातृ, माई तथा विजन-
इनका निर्माण विवाहोत्सव में मुख्य द्वार के सौन्दर्यीकरण के लिये किया जाता है। माई, विजन व द्वार मातृ बुरी दृष्टि व अशुभ को दूर करने की कामना से चित्रित किये जाते हैं।
विवाह का ज्यूति पट्टा-
इसमें महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती केन्द्र में बनाई जाती है। इनके साथ गणेश, सूर्य, चन्द्र व १६ मातृकाएं अंकित की जाती है। इन्हें चौकोर रेखिकीय चौखट में अंकित कर बाहर की ओर मछिया सिंगालिया अथवा खोडस वरों से अलंकृत किया जाता है। शीर्ष पर बड़े हिमालय व छोटे हिमालय का अंकन किया जाता है। इन सबके शीर्ष पर 'हलयाली बोट' - हरा पेड़ जो कल्पतरु माना जाता है, कमल (८ पंखुडियों वाला), शुक - सारिका (लक्ष्मी-नारायण) व दो हरे तोतों का निर्माण किया जाता है। राधा कृष्ण का चित्रांकन मनुष्याकृति में किया जाता है। शुकसारिका, शेष नाग की शय्या में लेटे हुए विष्णु व चरणों के पास लक्ष्मी तथा नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा की कल्पना को विशिष्ट रेखाओं द्वारा निर्मित किया जाता है।

यज्ञोपवीत का ज्यूति पट्टा-
इसका निर्माण विवाह ज्यूति की ही तरह होता है। मुख्य अन्तर यह है कि शीर्ष पर विष्णु-लक्ष्मी या कृष्ण-राधा की मानवीय प्रतिमा का रेखांकन नहीं होता। दूसरा अन्तर है शीर्ष पर बाईं ओर सप्त ॠषि मण्डल का जनेऊ पीरु की तरह बनाया जाता है तथा दाहिनी ओर छापरी (भिक्षा पक्ष का निर्माण) किया जाता है। मान्यता है कि 'गिरह जाग' पर बालक चुन्डित मुन्डित हो एक कौपीन मात्र पहनकर ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट करता है तथा विद्या अध्ययन के लिए काशी में अपने गुरु के पास जाता है। ब्रह्मचर्याश्रम में भिक्षा द्वारा ही अपना व गुरु पोषण का दायित्व वहन करता है। अध्ययन के उपरान्त उसका उपनयन व यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है। अत: इस अवसर पर ज्यूति पट्टे की पूजा अर्चना की जाती है।
छट्टी की ज्यूति व सामान्य ज्यूति-
यह ज्यूति पट्टा भी विवाह ज्यूति पट्टे की तरह ही होता है। परन्तु इसमें शीर्ष पर लक्ष्मी नारायण या राधकृष्ण की मानवीय अवयवों से युक्त प्रतिमा का आलेखन नहीं किया जाता है। बाकी अलंकरण व स्वरुप का विन्यास अन्य ज्यूतियों की तरह ही किया जाता है।
ज्यूति मातृका चौकी-
इसका निर्माण काष्ठ चौकी को हल्दी से रंग दिया जाता है। इसमें समस्त अलंकरण लाल रंग की रेखाओं द्वारा निर्मित किये जाते हैं। इसमें न तो किसी प्रकार के 'वर' बनाये जाते हैं और न 'छज्जा' बेल को बनाया जाता है। अन्य सभी प्रतीक व अलंकरण विवाह ज्यूति की तरह ही होते हैं। इसमें भी लक्ष्मी नारायण या राधा कृष्ण की युगल मानवीय आकृति नहीं बनाई जाती।
जन्माष्टमी का पट्टा या थापा-
सर्वप्रथम शिव पार्वती बनाये जाते हैं। उसके उपरान्त दशावतार निर्मित किये जाते है। शिव की जटाओं से गंगा व यमुना का उद्गम निर्मित किया जाता है। इसके उपरान्त कृष्ण की विस्तृत लीलाएं दर्शायी जाती हैं। इनकी अभिव्यक्ति पूर्णत: सुखसागर, भागवत के अतिरिक्त ब्रह्मपुराण व विष्णुपुराण के अनुसार होती है। इसमें गोवर्धन धारण इत्यादि को अंकित किया जाता है। चारों ओर सुन्दर गौ पुच्छ लता निर्मित की जाती है।
हरशयनी पट्टा-
इस थापे में विष्णु को शेषनाग की शैय्या पर लेटा हुआ तथा चरणों को दबाते हुए लक्ष्मी दर्शाई जाती है। क्षीरसागर का निर्माण किया जाता है। प्रतीक रुप से नीले गहन जल में मछली तथा कछुवा और नाभि से उत्पन्न कमल व उस पर चार मुख वाले ब्रह्म रेखांकित किये जाते है। चारों ओर घंटी या लगुली बेल बनाई जाती है।
हर बोधिनी पट्टा-
इसे तुलसी विवाह के अवसर पर मात्र लाल रंग से निर्मित किया जाता है। यह एक प्रकार की चौकी होती है। इसे १२ (बारह) बिन्दुओं से निर्मित किया जाता है। उसमें ४ भद व एक कँवल बनता है। इसे भी चारों ओर से सुन्दर लता व पुष्पों के निर्माण से भव्य रुप दिया जाता है। इसे 'बाल भद्र' के नाम से जाना जाता है।
दूर्वाष्टमी और डोर दुवज्योड़ा पट्टा-
इसमें सात रानिया, एक नौला (जल भरने का कूप), नौले में बच्चा बनाया जाता है। बच्चे के एक हाथ में माँ के गले में पड़े तागे को पकड़ रखा है। यह तागा डोर कहलाता है तथा हाथ में भुज दण्ड की तरह ३ पल्ले का धागा औरतें धारण करती हैं। इन्हें दुबज्योड़ा कहते हैं। यह एक प्रकार से स्रियों द्वारा जनेऊ की तरह पवित्र समझकर धारण किया जाता है। इन पर २-२ चिड़ियाँ बैठाई जाती है। इसका निर्माण लोक कथा पर आधारित है।
ॠषिपंचमी व नागपंचमी पट्टा-
इसमें वामनावतार (विष्णु) तथआ सप्त ॠषि बनाये जाते हैं। विशेष आकृति युक्त नाग जोड़े में होते हैं।
कुमाऊँ की आलेखन परंपरा के बारे में हम आगे के भागों में भी पढ़ते और जानते रहेंगे
( पिछला भाग-४ ) ................................................................................................( कृमश: भाग-६ )
संदर्भ के लिए पढ़ें:
थपलियाल रेखा १९९१ प्राचीन मध्य हिमालय कुमाऊँ का इतिहास : सांस्कृतिक भूगोल : नृवंशीय अध्यया। नई दिल्ली; नॉर्दन बुक सेन्टर।
पाण्डे बद्रीदत्त १९९० कुमाऊँ का इतिहास। अल्मोड़ा; श्याम प्रकाशन श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
जोशी महेश्वर प्रसाद १९९४ उतराञ्चल हिमालय समाज, संस्कृति, इतिहास एवं पुरात्व। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
बालदिआ, के. एस. १९९८ कुमाऊँ (लैंड एण्ड प्यूपिल)। नैनीताल; ज्ञानोदय प्रकाशन।
नौटियाल शिवानन्द १९९८ कुमाऊँ दर्शन। लखनऊ; सुलभ प्रकाशन।
सक्सेना कौशल किशोर १९९४ कुमाऊँ कला, शिल्प और संस्कृति। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
वाजपेयी श्री कृष्णदत्त १९६२ उत्तर प्रदेश का सांस्कृतिक इतिहास। आगरा; शिवलाल अग्रवाल एण्ड कम्पनी (प्रा.) लि.।
पाठक शेखर १९९२ पहाड़ हिमालयी समाज, संस्कृति, इतिहास तथा पर्यावरण पर केंद्रित। डी. के फाईन आर्ट प्रेस।
वर्मा विमला १९८७ उत्तर प्रदेश की लोककला, भूमि और भिप्ति अलंकरण। दिल्ली; जय श्री प्रकाशन।
मठपाल यशोधर १९९७ उत्तराखण्ड का काष्ठशिल्प। देहरादून; शिवा आॅफसेट प्रेस।
अग्रवाल, डी.पी. एवं एम.पी. जोशी १९७८ "रॉक पेंटिंग इन कुमाऊँ"। मैन एण्ड इन्वायरनमेंट भा. क्ष्क्ष् इंडियन सोसायटी फॉर प्रीहिस्ट्री एण्ड क्वार्टनरी स्टडीज (अहमदाबाद)।
त्रिवेदी विपिन बिहारी १९८७ उत्तर प्रदेश साहित्य, संस्कृति एवं कला। नई दिल्ली; एस. चन्द एण्ड कम्पनी (प्रा.) लि.।
उप्रेती नाथूराम १९७७ कुमाऊँ की लोककला, कुमाऊँनी संस्कृति। रुद्रपुर; उपयोगी प्रकाशन।
एटकिन्सन, ईयटीय १९७३ द हिमालयन गजेटियर वा. क्ष् व क्ष्क्ष्। दिल्ली; कास्मो पब्लिकेशन।
कठोच यशवंत सिंह १९८१ सध्य हिमालय का पुरातत्व। लखनऊ; रोहिताश्व प्रिन्टर्स।
गरोला, टी.डी. १९३४ हिमालयन फोकलोर। इलाहाबाद।
जैन कमल कुमार १९८३ उत्तराखंड के देवलयों का परिक्षण। लखनऊ; ध्यानम पब्लिकेशन।
जोशी, एम.पी. १९९२ उत्तरांचल (कुमाऊँ - गढ़वाल हिमालय)। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
जोशी प्रयाग १९९० कुमाऊँनी लोक गाथायें : एक सास्कृतिक अध्ययन। बरेली; प्रकाश बुक डिपो।
डबराल शिव प्रसाद १९९० उत्तराखंड का इतिहास। गढ़वाल; वीर गाथा प्रकाशन।
पोखरिया देव सिंह १९८९ "कुमाऊँ के लोकनृत्य", उत्तराखंड भाग - ३। उत्तराखंड शोध संस्थान।
प्रसाद जगदीश्वरी १९८९ कुमाऊँ के देवालय। अल्मोड़ा; उत्तराखंड सेवा निधि ।
पांडे त्रिलोचन १९७७ कुमाऊँनी भाषा और उसका साहित्य। लखनऊ; उ.प्र. हिन्दी संस्थान।
फ्रैंगुअर, ए.सी. १९९० दि जागर : हिमालय पास्ट एण्ड प्रजेन्ट। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
बैराठी कृष्णा एवं सत्येन्द्र कुश १९९२ कुमाऊँ की लोक कला, संस्कृति और परम्परा। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
बाजरोयी कृष्णदत्त १९९० भारतीय वास्तुकला का इतिहास। लखनऊ; उ.प्र. हिन्दी संस्थान।
नौटियाल, के.पी. १९६९ आर्कीयौलॉजी आॅफ कुमाऊँ इन्कलूडिंग। वाराणसी; चौखम्बा संस्कृत सीरीज।
भ मदन चन्द्र १९८१ उत्तराखंड का "पुरातत्व विशेषांक"।
मठपाल यशोधर १९८७ उत्तराखंड की संस्कृति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि उत्तराखंड वार्षिकी, उत्तराखंड शोध संस्थान।
वैष्णव यमुनादत्त १९८३ कुमाऊँ का इतिहास, "खस कस्साइट जाति के परिपेक्ष्य में"। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
पाण्डे, पी.सी. १९९० इथनोबौटनी आॅफ कुमाऊँ हिमालया, हिमालय इन्वायरनमेंट एण्ड डबलपमेट। अल्मोड़ा; श्री अल्मोड़ा बुक डिपो।
सर्राफ, डी.एन. १९८२ एंडियन क्राफ्ट्स। दिल्ली; विकाल पब्लिकिंशग हाऊस, अनसारी रोड।
पाण्डे गिरिश चन्द्र १९७७ उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था। नैनीताल; कंसल पब्लिशर्स।
पालीवाल, नारायण दत्त १९८५ कुमाऊँनी - हिन्दी शब्दकोश। दिल्ली; तक्षशिला प्रकाशन।
पाण्डे, चारु चन्द्र १९८५ कुमाऊँनी कवि 'गोर्दा' का काव्य दर्शन। अल्मोड़ा; देशभक्त प्रेस।
वैष्णव शालिग्राम १९२३ उत्तराखण्ड रहस्य। नागपुर-चमोली; पुष्कराश्रम।
सांकृत्यायन राहुल १९५३ हिमालय परिचय। इलाहाबाद; लॉ जर्नल प्रेस।
सिंह वीर १९८९ खेती और पशु : पहाड़ी खेती के आधार। नैनीताल; संपादक व प्रकाशक पाठक।
जोशी, एम.पी. १९७४ सम रेअर स्कल्पचर्स फ्राम कुमाऊँ हिल्स संग्रहालय पुरातत्व पत्रिका।
यह लेख मौलिक नहीं है, इसका मुख्य आलेख इस लिंक से लिया गया है, आप यहाँ पर भी सम्पूर्ण लेख को पढ सकते हैं।

0 टिप्पणियाँ