
प्योंली, फ्योंली या फ्यौलिड़ी (Yellow flax)
लेखक: शम्भू नौटियालदेवभूमि उत्तराखण्ड में बसंत ऋतु के आगमन के साथ प्योंली, फ्योंली या फ्यौलिड़ी (Botanical name: Reinwardtia indica) के फूलों की चादर ओढ़ लेती है। फ्योंली या बसंती का वैज्ञानिक नाम रीनवर्डटिया इंडिका हालैंड के प्रसिद्ध वनस्पतिज्ञ केस्पर जार्ज कार्ल रीनवर्डट् के नाम पर पड़ा। इसे Yellow flax और गोल्डल गर्ल भी कहते हैं। फ्योंली एक ऐसा फूल है जो पहाड़ की लोक संस्कृति में रचा-बसा है। यहां के लोक कवियों और गायकों ने इसे अपनी रचनाओं में उकेरा ही नहीं बल्कि इसे खुद में जीया भी है।

उत्तराखंड के कई लेखकों का कहना है कि पहाड़ों में प्योंली का खिलना बंसन्त के आने की सूचना देता है तो कवियों के लिए उनकी रचना का विषय भी देता है। जिसकी सुन्दरता से कवि अपनी कविता की रचना करते हैं। गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी द्वारा गाया गया बेहद लोकप्रिय गढ़वाली लोकगीत..
"हे जी सारयु मा फूली गे होली फ्योंली लयड़ि, मै घौर छोड़ि आवा।
हेजी घर बौंण बौड़ी गे होलु बालु बसंत मै घौर छोड़ि आवा।।"

इसी तरह एक और गीत भी प्रसिद्धि पाया
"फ्यौलिड़ी त्वे दिखिक ओन्दा ये मन मा। तेरू मेरू साथ थेई पहिला जनम् मा।"
दरअसल प्योंली/फ्योंली के बारे में कहा जाता है कि देवगढ़ के राजा की इकलोती पुत्री का नाम फ्योंली था जो अत्यधिक सुन्दर व गुणवान थी, लेकिन उसकी असामयिक मौत हो गई थी। राजमहल के जिस कोने पर राजकुमारी की याद में राजा द्वारा स्मारक बनाया गया था उस स्थान पर पीले रंग का यह फूल खिला जिसका नाम फ्योंली रखा गया।

आज भी प्योंली/फ्योंली शब्द देवभूमि से दूर रह रहे उत्तराखंडियों को भावुक कर देता है। पहाड़ों में बसन्त के आगमन का संदेश लाने वाली फ्योंली न सिर्फ अपनी सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है बल्कि यह एक आयुर्वेदिक औषधि भी है, जो कि कई प्रकार के रोगों के इलाज में प्रयुक्त की जाती है। लकवा, पीठ दर्द, सिरदर्द, घावों, फोड़े और फुंसी जैसी विभिन्न बीमारियों के इलाज में स्थानीय लोगों द्वारा इसके इथनोबोटैनिकल उपयोग के लिए जाना जाता है। इससे प्राकृतिक रंग भी प्राप्त होते हैं।

श्री शम्भू नौटियाल जी के फेसबुक पोस्ट से साभार
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