
(उत्तराखंड लोकप्रिय मसाला)
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(लेखक: जगमोहन साह)
(लेखक: जगमोहन साह)
उतराखण्ड के पहाड़ी इलाकों (विशेषकर गढ़वाल) में तड़के के रूप में खूब इस्तेमाल किया जाने वाला लोकप्रिय मसाला है। काली-भूरी रंगत वाले जख्या के दाने सरसों और राई के हमशक्ल होते हैं। किसी भी पहाड़ी रसोई में इसका दर्जा उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की मैदानी इलाकों में जीरे का है।
इसमें पाए
जाने वाले फ्लेवरिंग एजेंट इसके अद्भुत स्वाद के लिए जिम्मेदार हैं। आलू,
पिनालू, गडेरी, कद्दू, लौकी, तुरई, हरा साग, आलू-मूली के थेचुए और झोली (कढ़ी) आदि व्यंजनों में इसका तड़का लगाया जाता है।
आयुर्वेद में जखिया को बुखार, खांसी, जलन, हैजा आदि बीमारियों के लिए उपयोगी औषधि बताया गया है। अगर किसी को कभी चोट लग जाती है तो घाव को भरने के लिए उस पर जखिया के पत्तों का लेप बनाकर लगाया जाता है। इस प्रकार यह एक बेहतरीन फर्स्ट ऐड का काम भी करता है।
हाल के वर्षों
में कुछ चिकित्सा अनुसंधानों में ऐसा भी सामने आया है कि जखिया का तेल
दिमागी बीमारियों को ठीक करने में उपयोगी साबित हो सकता है।

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