
सिलफाड़ा या पाषाणभेद
लेखक: शम्भू नौटियालसिलफाड़ा या कमल्या वानस्पतिक नाम बर्जीनिआ सीलिएटा (Bergenia ciliata) है। कमल्या या जिसे पाषाणभेदा भी कहते हैं। सैक्सिफ्रैगेसी (Saxifragaceae) कुल का पौधा है। इसको संस्कृत में सिलफाड़ा व अश्वभेदा, अंग्रेजी में विन्टर बिगोनिया, हिन्दी में सिलफाड़ा, पत्थरचट्टा, सिलफेड़ा, गढ़वाली में कमल्या, कोदिया आदि नामों से जाना जाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में कई ऐसी वनौषधियों की भरमार है जिनमें कुछ के नाम से उसके गुण कर्मों को जाना जा सकता है। ऐसी ही एक वनस्पति जिसे स्थानीय भाषा में सिलफाड़ा, कमल्या, कोदिया, कोड़िया या पत्थरचट्टा के नाम से जाना जाता है। नाम से ही स्पष्ट है कि इस वनस्पति में पत्थरों को तोड़ देने के गुण मौजूद हैं। इसकी चौड़ी पत्तियों में दोनों ही और से रोएं होते हैं। सर्दियों में इसके पत्ते हरियाली लिए हुए होते हैं, लेकिन अत्यधिक ठण्ड पड़ने पर ये हल्के लाल रंग के हो जाते हैं।

यह एक बारहमासी पौधा है जो नमी एवं छायादार स्थानों पर पाया जाता है। इसकी पत्तियों के इस विशेष आकार के कारण ही इसे ‘एलीफेन्ट्स-ईयर’ भी कहते हैं। ये हिमालयी क्षेत्र में 900 से 3000 मीटर की उंचाई पर पाए जाते हैं I स्थानीय लोग इस वनस्पति के बारे में सदियों से इस बात को जानते है कि जहां यह वनस्पति लगेगी वहाँ की चट्टानें टूटी हुई होगी। इसकी लम्बाई 12 से 15 इंच तक होती है। इस पर पुष्प फरवरी से अप्रैल तक तथा फल मार्च से जुलाई में आते हैं तथा इसके पुष्पों का रंग गुलाबी होेता है। इसमें राइजोेम या प्रकन्द पाया जाता है। इसके प्रकन्द गोल ठोस तथा 1.5 सेमी लम्बे तथा 1.2 सेमी. मोटे भूरे रंग के होते हैं। इस वनस्पति का मुख्य कार्यकारी तत्व बर्गेनिन होता है।

हिमालयी क्षेत्र में लोग घरेलू उपचार के तौर पर इसकी पत्तियों का काढा बनाकर बुखार को ठीक कर लेते हैं, लेकिन इसका सबसे चमत्कारिक प्रभाव मूत्रवह संस्थान पर है। इस वनस्पति का इस्तेमाल आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा में गुर्दे (किडनी) की पथरी की दवा बनाने में किया जाता है। इसकी पत्तियों में पाए जानेवाले फेनोलिक कंपाउंड के कारण इसके पत्तियों के काढ़े का प्रयोग कैल्शियम फास्फेट एवं केल्शियम ऑक्सेलेट के कारण बनने वाली गुर्दे (किडनी) की पथरी को तोड़कर बाहर निकालने में किया जाता है।

स्थानीय वैद्य इसका प्रयोग सदियों से पथरी की चिकित्सा में करते आ रहे हैं I आयुर्वेदिक चिकित्सक भी इस वनौषधि में पाए जानेवाले तिक्त -कषाय एवं भेदन कर्म जैसे गुणों के कारण इसका प्रयोग रुके हुए मूत्र को निकालने में तथा किडनी-स्टोन की चिकित्सा में करते हैं। इसके अलावा इस दुर्लभ वनस्पति का प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाने, शुगर लेवल को कम करने एवं लीवर टानिक के रूप में किया जाता है। इसकी पत्तियों का प्रयोग कमर में होने वाले दर्द में सिकाई करने हेतु भी प्रयोग किया जाता है। इसके जड़ों से निकाले गए रस का प्रयोग खांसी, जुखाम, दमा, उदरशूल एवं दस्त लगने जैसी स्थितियों में दवा के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग त्वचा रोगों में कटने जलने, एलर्जी आदि में किया जाता है। इसमें कवकनाशी गुण भी पाये जाते हैं जिसके कारण यह त्वचा की कवक से सुरक्षा करता है।

उत्तराखण्ड में सदियों से निभाए जा रही रस्मों तथा रीति-रिवाजों का दायरा सिमटता जा रहा है रीति-रिवाज केवल नाम के लिये अपनाए जा रहे हैं। इसमें प्रयुक्त किये जाने वाले पौधों के बारे में जानकारी न होने के कारण इनका प्रयोग कम हो रहा है जबकि गाजर घास, काली बांसिग, लैन्टाना आदि विदेशी घासों के द्वारा इनके आवास पर अतिक्रमण किया जा रहा है व परम्परागत ज्ञान नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पा रहा है जिससे इन बहुमूल्य जातियों का संरक्षण नहीं हो पा रहा है। आवश्यकता इसी बात की है कि इस प्रकार के पौधों हेतु राॅक हर्बल गार्डन बनाकर इन्हें आजीविका का साधन बनाया जाय।

श्री शम्भू नौटियाल जी के फेसबुक पोस्ट से साभार
श्री शम्भू नौटियाल जी के फेसबुक प्रोफाइल पर जाये
0 टिप्पणियाँ