छिलुक उपन्यास में पर्वतीय परिवेश

छिलुक उपन्यास में पर्वतीय परिवेश-कुमाऊँनी साहित्य चर्चा, kumaoni upanyas ki sameeksha,review of kumaoni novel chhiluk

छिलुक उपन्यास में पर्वतीय परिवेश

लेखिका: डॉ. जगदीश चंद्र पंत

कुमाउनी भाषा में 'छिलुक' उपन्यास साहित्यकार लेखक पूरन चंद्र कांडपाल द्वारा लेखी रौ।  उपन्यास में मुख्य पात्र छन हंसादत्त, देवदत्त, हरदत्त, पुष्पा, किशनदेव, कैलाश, सरू, माधोराम (चपरासी), घनान्द (बड़े बाबू), जमन सिंह, हिर सिंह, पिर देव आदि।

उपन्यासकार ठेट ग्रामीण परिवेश के देखि बेर शब्द चयन में माहिर छ।  भावानुसार शब्दचयन उनर वैशिष्टय छु।  लू छालू छ, अटासेल, कड़कड़ाट, डमडमाट, गणगणाट, उड़दौड़बाजी, पण-तुमड़ि, हेझाजरि, फड़फड़ानै, बड़बड़ाने, रघोड़ा-रघोड़ी, भटभटाट, पिडपिड़े, नरनराट, कलकलाट, लमपसार, दुरमुराट, बलाणी- चुलाणी, गुमसुम, कचकचबाजी, क्वचडैन, मुछ्याव, टटकालै, पैच्वाणि भान, पुतपुताई जास अनेक आँखर छन, जनन के संयुक्ताक्षर लै कै सकनी।  उनर अर्थ पुर वाक्य लिख बेर लै नी मिल सकन।  शब्दन में अर्थ गाम्भीर्य छू जो लोकभाषा में मिल सकों।

उपन्यासकार कहावत व मुहावरों प्रयोग करन में सिद्धहस्त देखीण रई।  वड़ घा नि खां रय, जो गौं जाण नैं वांक बाट के पुछण, मैतोड़ा जूलौ लमकना खूलौ, ध्वैड़ के चांठ प्यार, हाती कानाक माख, आँख-कान लुकै रई, जब जालै अल्माड़ तब लागल गल्माड़, कब थोरि ब्यां कब खोरि खां, कणा कणा तिकै चैनी द्वि आँख साण, को बाव बादा को डाड़ मारा, मन करौ गाणी माणी करम करौ निखाणी, तेरि पैलाग मेरि भैंसा सीङ में, लोटणी मी है रौछी, ढ्यस त्यर लाग, हुणी च्यालाक गणुवै न्यारै, चोर कि चुई झसैक, छां हैं जाण ठ्यक के लुकौण, अकल कणी उमर कैं भेट नी हुनी, अदपुरि विद्या झगणक काव, पौण पर मन हुन तो चुल पर आग हुन, धोबि क कुकुर नैं घर क नैं घाट क।  उनूल कुमाउनी कहावतों व मुहावरों क प्रयोग भौत भल प्रकारल करि राखौ।  य है बेर हौर लै अनेक कहावत व मुहावरा छन, जनर उपन्यासकार द्वारा सफल प्रयोग करि रौ।

उपन्यासकि विषयवस्तु में हंसादत्त एक पर्वतीय किसान छन।  उनरि चेलि पुष्पा क ब्या देवदत्त क च्यल हरदत्त दगड़ि है रय।  किसन देव क एक्कै च्यल कैलाश हय।  पुष्पा ब्या में किसनदेवल भौत सहयोग कर।  किसनदेव एक मुनीम क काम करनी, उनार दगड़ी हंसादत्त शहरक इंटर कौलेज में चपरासि छी।  द्विए नौकरी करणक वास्ते दगडै जनेर भाय।  हरदत्त इंटर कालेज में पढ़नेर हाय व सामाजिक काम में जुड़ी रौनेर भाय।  उनार द्वि नान लै है गाय।  पुष्पा मैंसल जुगाड़ करि बेर कैलाशकि नौकरी जंगलाद में लगै दी।  वीक ब्या सरू दगड़ि कराई गोय।  कैलाशकि आदत शराब पिणकि है गोइ।  पुष्पा कैलाशक च्यल हेमू के पढ़ौणक लिजी आपण वां ली गेइ और उकणि शिक्षित करणक लिजी भौत भल प्रयास करौ।  पर के करी जाओ वीक च्यल हिमू क पढ़न में ध्यान कमै लागनेर भय, फिर लै जोड़ जन्तर लगै बेर कसीकै वीकि नौकरी एक प्राईवेट कंपनी में लगैछ।  हिमूक पालन-पोषण लिजी पुष्पा व हरिदत्त क कयेक बार अनबन लै है जांछी।  पुष्पा वीकि महतारी जसि बणी रै।  दुसरक च्यल पर इतक ध्यान भारतीय समाज में कम देखण में औंछ, पर पर्वतीय समाज में यो एक दृष्टांत स्थापित है गोछ।  उपन्यासकार के हर स्तर पर कामयाबी मिल रै।  पुष्पा यमें दुसर किरदार बण बेर उज्याव में ऐ जैं।  उकण छिलुक जस जगण पड़ौं।  यै हिसाबल उपन्यास क नाम 'छिलुक' सार्थक छू।

महान साहित्यकार प्रेमचंद्र 1936 क भारत देशक चित्रण करण में सफल रई वी तर्ज पर साहित्य में पर्वतीय परिवेश कें स्थापित करन में पूरन चंद्र कांडपाल सफल रई छन।  उपन्यासकार 1960 क आसपास यानी सातवें दशक क पर्वतीय चित्र, भूगोल, सामाजिक ताना-बाना, शिक्षा, पर्यावरण, कार्यालयी व्यवस्था, जल, जंगल, जमीन आदि बिंदुओं पर कथ्य आधारित पात्रों द्वारा अभिव्यक्ति करण में अत्यधिक प्रयासरत छन।  पहाड़ में आज लै शराब पिणकि आदत में कयेक मनखी बदनाम छन, यो चित्र उनन द्वारा यो प्रकारल खेंची रौ।

“शातीरों क दगड़ केलै करूं ऊ?  चोर क दगड़ी चोरि नि लै करलौ चोर कई जांछ।  कतू ता समझै मील उकैं।  रोज शराब पिहैं डबल कांबै औनी वीक पास? 
 सब मिल जुल बेर गुलछर्र उडूनी यूं लोग।  हरामकि कमै शराब में जींछ" हरदत्त जोर ल बलाय।  जरा सी बात में पर व्यवस्था पर एक भयंकर हथोड़ मारि बेर उपन्यासकार सड़ी गली सिस्टम में आमूलचूल परिवर्तन करण चाण रई।  कती-कती पर उपन्यासकार एक दार्शनिक जै बण जाण रई, "माया-मोह क जाल में सबै इंसान यसिकै जकड़ी हाय।  मनखी भुलि जांछ कि उ यां खाली हात आंछ और खाली हात है लै जाल।  यौ जिंदगी में यां सिर्फ चार दिन क ड्यर छ।  यां बै सबूल एक न एक दिन जाणै हय।"  कभतै कहानी में एक फिल्मी अंदाज लै ऐ जांछ।  एक घटना दुसर पर मिली हुई छु।  तारतम्य में जुड़ी हुई छन।  यई उनर सफलता सूत्र छ।  कुल मिलै बेर यो कई जै सकों कि 'छिलुक कुमाउनी उपन्यास आपण शिल्प संयोजन में सफल हैरौ।

... * बिठौरिया नं.-1, हल्द्वानी

‘पहरू’ कुमाउनी मासिक पत्रिका , सितंबर 2018 अंक बै साभार

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