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वँढ सरकै…हे ब्वारि ठुल!

रचनाकार - सुन्दर कबडोला

लो हैगे धुँमण गँड भिड लागो घुमण
सैणियो कँच दाथुलि ठँण
एक हाथ सरगो
ब्वारिक हाथ जैठानि चढगो
लो हैगे धुँमण गँढ भिड लागो घुमण
ऐच पेच स्याँडा बैठ
साँस सौरा ख्वर मा घैच
जेठ पुरी मा हैईण न्याँर
असोज लगि दर्पिल त्याँर
नि चलि बस मा गँढ
काँन भरि मैसि पँढ
वँढ सरकै बाँट फरकै
खुँसाणि खुँण ब्वारिक धुँन
दब्यत लोटाई ब्वाँरि गुँण
सौरा गीज बिडि मुँण
धुँगरि पट हैई धुँमण
बुँढ बाँढि क कैले सुँण
जूण मरि आँखण घुँर्ण
जूण मरि आँखण घुँर्ण




लेख   - सुन्दर कबडोला ©copy right, All Rights Reserved

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