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फरेब - कुमाऊँनी गजल

कुमाऊँनी गजल


चांद तारों दगड़ि बात कर्नि भै
भीं पन लै चान भ्यों कभैं-कभैं।
घोल उच्चा हांउव में बना चाहे
जड़ बोट कि मजत हुनिं चैनि भै।
धोति-टोपि कतुकै बदलते रओ तुम
अपनि बोलि-बातुंल पछयाण हुनिं भै।
नगर-महानगर कतुकै चमकदार होउन
अपन गौं-गाड़ कि बात, कुछ औरै भै।
दुनियां में चाहे कोई ले न्है जाओ
अपन बाखलि-ऑऊज कि बातै गजब भै।

बैद याँ बीमार छन, कसो छ यो जलिम बखत
तीन-पांच कि सब हैरै, आब याँपन जुगत।
अदाकारी है ग्यान हो, सब रसम और रिवाज
कै धैं कूनूँ , को सुँणल, को को दिंह आब याँ जबाब।
कसा-कसा रहनुमा छन, कसि-कसि छन इनरि काथ
कसो यो बखत आयो,  खापै में हरानि बात।
इतुक चकमकाट, म्याला, छ्म्याला औरै छन
अपन गौं कि तर्प जानू, इ बात छू ठूलि बात।
बैद याँ बीमार छन, ग्यान-ध्यान हैगो गायब
किसम-किसम कि चालाकि छन, कसा-कसा छ्न फरेब।

दिनेश भट्ट, सोर पिथौरागढ़

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