भरूच का सींग
अहमदाबाद बटी रत्तै छै बाजियै गाड़ि(डबल डेकर) में बैठि बेर ठुल दाज्यू-बोजि और मैं बॉम्बे सैंट्रल हूं बाट लागियां। यो दिसम्बर आखरी म्हैंणै बात छ। आइ झुकमुक उज्याव है रौछी लेकिन स्टेशन में रात दिन क् के अंतर न्हैंती। यां चहा, कॉफी, इडली बाड़ जाणि के के खाण पाकि बेर तय्यार छी। बस खस्स जेब बटी डबल निकालणै देर छी। मैं सोचणैछ्यूं -धनशाबासि यो रिस्यारों हूं। ह्यूनां दिनन एतू रत्तै पर हम चहा बणून में लै आलस करनूं।
मुणि मुणि कै हमरि गाड़ि अघिल हूं सरकणैछी और आणंद पुजते पुजते खाण बेचणी मैंस गाड़ि में लै ऊण भैगोछी।दाज्यूल आपूं हुं कॉफी और बोजी लिजी म्यार लिजी टमाटरक् सूप ल्हे। जरा जाड़ कम जस भौ। आब गाड़िल रफ्तार पकड़ि है छी। यो नान नान स्टेशनों में रुकनि नैं। द्वि घंट लगातार चलि बेर आठ बाजी बरोडा में द्वि मिनटा लिजी रुकी फिर वी रफ्तार(अहमदाबाद बटी बंबई सफर कएक पैसिंजर गाड़ि दस बार घंट में पुर करनी) यो केवल सात घंट में पुजै द्यैं।
नान ठुल स्टेशन आते रईं, करीब साढ़े तीन घंट में हम सूरत पुजि गोछ्यां, ऐल जालै हमूल घर बटी ल्याई रोट साग खै हैछी और आपस में बातचीज में मगन छ्यां। आब गाड़ि में खाणी पिणी सामाना दगाड़ै घर गिरस्थी कतू किसमा सामान बेचणी ऊंण लागि रौछी कि एतुकै में बोजिल दाज्यू धैं कौ -
हंहो सुणौ धैं त सींग सींग जस कुणौ, के सींग छ।
हम द्वि लै चुप है बेर एक बेचणी कैं ध्यानैल देखण भैट्यां। वी हात में एक झोल छी, उ मुणि मुणि देर में कुणौंछी-
सींग लेलो सींग, भरूच का सींग। बीस रूपये का छोटा सींग, पचास का बडा़ सींग।
आब हम हकबकै बेर जस एक दुहरा मुख चाणोंछ्यां, सींग वाल मुणी अघिल सरकौ एक सीटाक अघिल ठाड़ है गो। वी पुठ हमार तरुब छी। हम नि देख पाया कि उ सींग कस छी। फिर सींग वाल अघिल डाब हूं न्है गो। मैंल कौ-दाज्यू सरकारा तरुब बटी त जानवरों अंग बेचणैं सख्त मनाही छ यो कसि गाड़ि छ जै में खुलेआम सींग बेचीणी।
दाज्यू लै के कूछी। अनमनीण जास चुप रई। हां बोजि और मैं भौत देर जालै यै बार में बात करणौंछ्या। हमर मन छी कि उ सींग वाल ऐ जांछ्यो एक बार त ल्हिणा बहानैंल सींग जरूर देखछ्यां।
करीब आद्दू घंट में फिर उ सींग सींग कुण भैगोय। आब त म्यार कैल नि रईण,मैल सोचौ कि उकैं बलै बेर सींग देखनूं और आखिर में मन नि ऐ कै नि ल्ह्यूं। यस त कएक करनी। सींग वाल पास आ त मैंल कौ-भय्या एक सींग दिखाना।
वील कौ-छोटा या बड़ा।
मैंल एसिकै कै दे -दोनों दिखा। आब वील झोल बटी द्वि मूंमफली पैकिट निकालि बेर म्यार हात में धरि दीं। मैंल कौ- भय्या मूंगफली नहीं भरूच का सींग देना।
म्यर एतू कूंण छी उ बेचणी हंसण भैगो।
फिर वील कौ -आप यूपी के हो।
मैंल कौ -क्यूं
वील कौ- मैं भी यूपी का हूँ वहाँ जिसे मूंगफली कहते हैं गुजरात और महाराष्ट्र में सींग बोलते हैं। आब हमन लै हंसि ऐ गे। मैंल कौ- फिर भय्या ये भरूच क्या हुआ।
वील हंसते हंसते कौ- अभी अभी जो स्टेशन छूटा वो भरूच ही था, आपने देखा नहीं। यहां बहुत मूंगफली होती है। इसलिए भरूच का सींग कहते हैं।
सींग वाल हंसनै अघिल कै न्है गोय।
बज्जर पडौ़ यो गुजरात ऐ बेर एक बार और भाषा में भभरी ग्यूं।
अहमदाबाद बटी रत्तै छै बाजियै गाड़ि(डबल डेकर) में बैठि बेर ठुल दाज्यू-बोजि और मैं बॉम्बे सैंट्रल हूं बाट लागियां। यो दिसम्बर आखरी म्हैंणै बात छ। आइ झुकमुक उज्याव है रौछी लेकिन स्टेशन में रात दिन क् के अंतर न्हैंती। यां चहा, कॉफी, इडली बाड़ जाणि के के खाण पाकि बेर तय्यार छी। बस खस्स जेब बटी डबल निकालणै देर छी। मैं सोचणैछ्यूं -धनशाबासि यो रिस्यारों हूं। ह्यूनां दिनन एतू रत्तै पर हम चहा बणून में लै आलस करनूं।
मुणि मुणि कै हमरि गाड़ि अघिल हूं सरकणैछी और आणंद पुजते पुजते खाण बेचणी मैंस गाड़ि में लै ऊण भैगोछी।दाज्यूल आपूं हुं कॉफी और बोजी लिजी म्यार लिजी टमाटरक् सूप ल्हे। जरा जाड़ कम जस भौ। आब गाड़िल रफ्तार पकड़ि है छी। यो नान नान स्टेशनों में रुकनि नैं। द्वि घंट लगातार चलि बेर आठ बाजी बरोडा में द्वि मिनटा लिजी रुकी फिर वी रफ्तार(अहमदाबाद बटी बंबई सफर कएक पैसिंजर गाड़ि दस बार घंट में पुर करनी) यो केवल सात घंट में पुजै द्यैं।
नान ठुल स्टेशन आते रईं, करीब साढ़े तीन घंट में हम सूरत पुजि गोछ्यां, ऐल जालै हमूल घर बटी ल्याई रोट साग खै हैछी और आपस में बातचीज में मगन छ्यां। आब गाड़ि में खाणी पिणी सामाना दगाड़ै घर गिरस्थी कतू किसमा सामान बेचणी ऊंण लागि रौछी कि एतुकै में बोजिल दाज्यू धैं कौ -
हंहो सुणौ धैं त सींग सींग जस कुणौ, के सींग छ।
हम द्वि लै चुप है बेर एक बेचणी कैं ध्यानैल देखण भैट्यां। वी हात में एक झोल छी, उ मुणि मुणि देर में कुणौंछी-
सींग लेलो सींग, भरूच का सींग। बीस रूपये का छोटा सींग, पचास का बडा़ सींग।
आब हम हकबकै बेर जस एक दुहरा मुख चाणोंछ्यां, सींग वाल मुणी अघिल सरकौ एक सीटाक अघिल ठाड़ है गो। वी पुठ हमार तरुब छी। हम नि देख पाया कि उ सींग कस छी। फिर सींग वाल अघिल डाब हूं न्है गो। मैंल कौ-दाज्यू सरकारा तरुब बटी त जानवरों अंग बेचणैं सख्त मनाही छ यो कसि गाड़ि छ जै में खुलेआम सींग बेचीणी।
दाज्यू लै के कूछी। अनमनीण जास चुप रई। हां बोजि और मैं भौत देर जालै यै बार में बात करणौंछ्या। हमर मन छी कि उ सींग वाल ऐ जांछ्यो एक बार त ल्हिणा बहानैंल सींग जरूर देखछ्यां।
करीब आद्दू घंट में फिर उ सींग सींग कुण भैगोय। आब त म्यार कैल नि रईण,मैल सोचौ कि उकैं बलै बेर सींग देखनूं और आखिर में मन नि ऐ कै नि ल्ह्यूं। यस त कएक करनी। सींग वाल पास आ त मैंल कौ-भय्या एक सींग दिखाना।
वील कौ-छोटा या बड़ा।
मैंल एसिकै कै दे -दोनों दिखा। आब वील झोल बटी द्वि मूंमफली पैकिट निकालि बेर म्यार हात में धरि दीं। मैंल कौ- भय्या मूंगफली नहीं भरूच का सींग देना।
म्यर एतू कूंण छी उ बेचणी हंसण भैगो।
फिर वील कौ -आप यूपी के हो।
मैंल कौ -क्यूं
वील कौ- मैं भी यूपी का हूँ वहाँ जिसे मूंगफली कहते हैं गुजरात और महाराष्ट्र में सींग बोलते हैं। आब हमन लै हंसि ऐ गे। मैंल कौ- फिर भय्या ये भरूच क्या हुआ।
वील हंसते हंसते कौ- अभी अभी जो स्टेशन छूटा वो भरूच ही था, आपने देखा नहीं। यहां बहुत मूंगफली होती है। इसलिए भरूच का सींग कहते हैं।
सींग वाल हंसनै अघिल कै न्है गोय।
बज्जर पडौ़ यो गुजरात ऐ बेर एक बार और भाषा में भभरी ग्यूं।
फोटो सोर्स गूगल


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