'

च्यला चौमास लाग गो

श्याम जोशी








च्यला चौमास लाग गो

पाखैकी धुरी फिर टपकण लागि गे।
कुड़िकी दादर अल्बेर फिर सड़ गो।।
च्यला चौमास लाग गो।

पाखक बाँसम फिर ढ्य्युड़ लाग गो।
हांगा पन अल्बेर फिर रिहुड़ पड़ गो॥
च्यला चौमास लाग गो।

गाड़ गध्यारम पाणी खूब सुसाट हे रो।
गोठ पन गोरुल अणाट धुराट लगे रो॥
च्यला चौमास लाग गो।

खेती पाती सब चौपट हेगी।
च्यला यां ते बड़ी आफत एगी।।
च्यला चौमास लाग गो।


रचनाकार: श्याम जोशी अल्मोड़ा

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ