
"कुमाऊँनी होलियों में आशीष देने की समृद्ध परम्परा"
लेखक: श्री चन्द्रशेखर तिवारी
पहाड़ की होलियों में आशीष देने की भी समृद्ध परम्परा रही है। आशीष के
ये आँखर ,रंग भरी होली के समापन पर गाँव के बुजुर्ग और होली के जानकार
जिन्हें डांगर या महन्त कहते हैं, अपने खास लहजे में देते हैं फिर होल्यार
समवेत स्वरों में "हो हो होलक रे " कहकर उसमें भाग लगाते हैं-
हो हो होलक रे
बरस दिवाली बरसे फाग
हो हो होलक रे
जो नर जीवें खेले फाग
हो हो होलक रे
हमरा ....अमुक जी रौ लाख सौ बरीस
हो हो होलक रे
उनरा पूत परिवार कुटुम्ब जी रौ लाख सौ बरीस
हो हो होलक रे।
बरस दिवाली बरसे फाग
हो हो होलक रे
जो नर जीवें खेले फाग
हो हो होलक रे
हमरा ....अमुक जी रौ लाख सौ बरीस
हो हो होलक रे
उनरा पूत परिवार कुटुम्ब जी रौ लाख सौ बरीस
हो हो होलक रे।
आशीष के इन्ही बोलों के साथ साथ ये रंग भरी होलियाँ धीरे धीरे समापन की ओर बढने लगती हैं.... जन मानस के विश्वास के आधार पर अब ये होलियां मथुरा को प्रस्थान करने लगती हैं। होली के इस गीत को गाकर होलियारों को निश्वास सा लगने लगता है -
रंग की गागर सिर में धरे
आज कन्हैया रंग भरे
होरी खेली खाली मथुरा को चले
आज कन्हैया रंग भरे.....।
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