'

फूल देई (देली पूजा)

चैत्र मास की पहले तिथि (चैत्रीय संक्रांति )को `फूल देई `मानी जाती है। Phooldei is the festival of Indian new year celebration and greeting by children spreading flowers in doors

फूल देई (देली पूजा)
लेखिका: ज्योतिर्मई पंत

हमारे देश में ऋतु-परिवर्तन के आधार पर कई त्योहार माने जाते हैं। ठिठुराती सर्दी की विदाई के साथ जब वसंत ऋतु आती है तो स्वयं प्रकृति ही नईरूप सज्जा से सुशोभित होकर मन में ऐसी उमंग जगाती है कि लोगों का मन नाचने-गाने को करता है।  शिव रात्रि, बसंत पंचमी फिर होली, होली तो मस्ती, ख़ुशी और रंगों से भरपूर होती है।  उसके बाद चैत्रमास आरम्भ होते ही कई उत्सव मनाए जाते हैं।

उत्तराखंड में सौर और चन्द्र पंचांग के आधार पर कई विशेष त्योहार मनाए जाते हैं जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलते।

चैत्र मास की पहले तिथि (चैत्रीय संक्रांति )को `फूल देई `मानी जाती है।  इस दिन हर घर की छोटी-छोटी कन्याएँ सज धज कर पूजा की थाली में चावल ,प्युली,बुरांश, गेंदे के फूल, पत्तियाँ, नारियल, गुड आदि सामग्री सजाकर अपने घर की देहरी की पूजा करती हैं फिर आस-पास के सारे घरों में जाकर देहरी(देली) की पूजा करती हैं।
चावल और फूल सजाती हुई अपनी सुमधुर आवाज़ में ये आशीर्वचन गाती हैं....... 
फूल देई छम्मा देई 
दैणि द्वार भर भकार
तेरी देई नमस्कार .. 

जिसमें घर की देहरी से विनम्र प्रार्थना की जाती है कि इस घर के भंडार सदा भरे रहे।  देहरी सबके लिए शुभकारी हो उसको सदा नमन.हर घर कि महिलाएँ अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनको गुड,चावल और रूपये-पैसे भेंट देती हैं।  कन्याएँ सभी घरों में जाती हैं कोई घर छोड़ा नहीं जाता.यह समाज के हर घर की खुश हाली की कामना से जुड़ा हुआ है।  बाद में हर घर से एकत्रित चावलों से एक विशिष्ट व्यंजन बनाया जाता है जिसे सै या सैह कहा जाता है।  पहले चावलों को धो कर, भिगो कर, फिर छाँव में सुखाकर पीसा जाता है फिर दही में थोड़ी देर भिगो कर घी में भून कर गुड मिला कर पकाया जाता है।  जो हलवे की भांति स्वादिष्ट होता है इसे भी आस-पड़ोस में बाँट कर ही खाया जाता है।

इस त्योहार की विशेषता है कि एक तो ये वसंत के आगमन की खुशियों का द्योतक है।  
दूसरा ..यह एक बाल-पर्व है जिसमें कन्याएँ भाग लेती हैं।
तीसरा ..समाज और आस-पास के लोगो के लिए कल्याण की कामनाओं से युक्त है और सब से महत्वपूर्ण है ....उस घर के मुख्य द्वार का पूजन जो घर हमें हर तरह का सुख, आश्रय और सुरक्षा देता है।  घर से प्रिय और कौन सा स्थान है? और वहाँ आने-जाने के लिए हम हमेशा ही देहरी लाँघते रहते हैं।  गाँवों और छोटे कस्बों की यह परम्परा बड़े शहरों के लोगो के लिए कितनी विस्मय कारी है?  जहाँ हमारे पडोसी भी अजनबी से लगते हैं और दरवाजों पर कितने ताले-चिटकनी लगी होती हैं।  कोई अपना भी आये तो सूक्ष्म -छिद्र से तसल्ली करने के बाद ही दरवाज़ा खुलता है।  ऐसे में ये त्योहार यादों में रच-बस जाते हैं।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ