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चाहा केतलि

कुमाऊँनी कविता, यस में उणें याद, पहाड़ने कि बात ओहो आहा।  उ लाकड़ानक धुंगांक मलि, कालि केतलि वालि चाहा।Kumauni Poem about Tea Kettle in Kumaun

 "चाहा केतलि"
(रचनाकार: उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम")

सुप्रभात दगड़ियो।
आज भो यां लखनऊ पन भौत जाड़ हरौ। 
धूप लै नि ऊंणें।
लियो प्रस्तुत छू आजैकि कुमायूंनी कविता।

पहाड़न में चटक धूप हरै, घाम तापड़ैंकि चौल।
यां देशन में पार वां जालै, यदुक जै हरौ हौल।
यदुक जै हरौ हौल , बज्जर पाल लै पड़ नौ।
अरड़ हगो यदू, हाथ खुटन में खाल जै पड़ नौ।
यस में उणें याद, पहाड़ने कि बात ओहो आहा।
उ लाकड़ानक धुंगांक मलि, कालि केतलि वालि चाहा।

सगड़ में क्वैलकि आंच भै, जाँति भै वीक मली।
भेर बै कालपट्ट भीतेर बै पिल, वीक मलि भै चहा केतलि।
वीक मलि भै चहा केतलि, चहा चुड़कन हुनेर भय यदुक।
त्वाप जाणिं उमें दूध हुंछी, मिश्रिक हुनैर भै टपुक।
हाथन में चहा गिलास पकड़ौ, हाथ कूं लै तापि लियो।
थोल में गरम गरम लगूंहूं, दिन मान भर चाहा पियो।

हैप्पी हैप्पी जाड़ हो!!


जै जै हमार पहाड़! जै जै उत्तरांचल!
उमेश त्रिपाठी (काका गुमनाम) द्वारा रचित एंव प्रसारित।
उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" 07-01-2018
श्री उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" जी की फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी शब्द सम्पदा पोस्ट से साभार

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