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नईं और पुरांण - कुमाऊँनी कविता

कुमाऊँनी कविता, ध्यान तुम धरिया।  पैली रत्तिब्याणक नायी, दुहर बाबु क ठहराई ब्या।Kumauni Poem about casual lifestyle of new generation youths

 "नईं और पुरांण"
(रचनाकार: उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम")

सुप्रभात हो दगड़ियो।
प्रस्तुत छू आजैक कुंमायूनी कविता "नईं और पुरांण"

दुनी बदलि, बदलि चाल बदलि उनरि लय।
ना सितड़ौंक कोई टाइम, ना रत्तै उठडौंक समय।
ना रतै उठडौंक समय, सुंण बेर जै लागू धक्क।
भैर जानि डिग्री लिहूं, कर लिनी नैन मटक्क।
ओ मम्मी पापा बतै दिनूं, बिन ब्या करिये मरुल।
मैं ब्या करुंल तो समझ लियो, उ दगड़े ही करुंल।
जाड़न में गर्मिन में चिप्स चैंनी, कोल्ड ड्रिंक पीनी।
घरक खांहूं देखि बेर तो य सब , नाख गन्यै दिन।
आजैकि पीढ़ी देखो | हरै, बिल्कुलै ठुल नबाब।
यनुकू रोज पिज्जा बर्गर चैं , चैंनी टुंडे वाल कबाब।
कदू जै यनरि बात बतू , वीक न्है ओर-न-छोर।
लूंण खुश्याणिं तो हरै गईं, लाशण में हैरौ जोर।

हाय रे एक हमर छी समय, फ्रीफंड में खांछी डंड।
सिद्द है जांछी डंड देखबेरे, ठुल ठुल वाल उइंड।
जदूलै हुंछी उद्दड, दिल हमर जां छी धड़क।
सुरयाव गिल हैजांछी, बाबु जब छोड़ छी नड़क।
छोड़ छीनड़क, समझ लियो कस हुनल हमार संसार।
सितंढ़ लै टाइम पार, और उठंड लै टाइम पार।
रत्तै जल्दी उठ बेर आपुंण , किताब में ध्यान दियो।
इज जो देली खांहूं, उकू चुपचाप खै लियो।
सिगरेटा टुकुड़ चै चितै बेर, जलूंछी वीक बट्ट।
यई छी आपुंण इंटरटेनमेंट, और सब में छी खड़पट्ट।
बाबू कुंछी द्वी श्रेष्ठ चीज़नक, ध्यान तुम धरिया।
पैली रत्तिब्याणक नायी, दुहर बाबु क ठहराई ब्या।


जै जै हमार पहाड़! जै जै उत्तरांचल!
उमेश त्रिपाठी (काका गुमनाम) द्वारा रचित एंव प्रसारित।
उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" 03-01-2018
श्री उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" जी की फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी शब्द सम्पदा पोस्ट से साभार

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