
गहत, कुलथ, कुल्थी या घौत (Hoursegram)
लेखक: शम्भू नौटियालगहत, कुलथ, कुल्थी या स्थानीय नाम घौत वानस्पतिक नाम है मैक्रोटाइलोमा यूनिफ्लोरम (Macrotyloma uniflorum)। फैबेसी (Fabaceae) या दलहन कुल से संबंधित है। इसे संस्कृत में कुलत्थ तथा अग्रेजी में हॉर्सग्राम कहते है। प्राचीनकाल से भारत के शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में कुलथ या गहथ सबसे महत्वपूर्ण फसल है। खरीफ की फसल में पैदा होने वाली गहत काले व भूरे रंग की होती है। इसके बीज देखने में उड़द के समान हल्के लाल, भूरे, धूसर काले या चितकबरे रंग के हो सकते है। गहत की दाल उत्तर भारत के उत्तराखण्ड, हिमाचल के अलावा उत्तरपूर्व और दक्षिण भारत में भी खूब खाई जाती है। नेपाल, बर्मा, भूटान, श्रीलंका, मलेशिया और वेस्टइंडीज में भी चिकित्सकीय गुणों वाली दाल गहत भोजन का अभिन्न अंग है।
इसकी खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है तथा भूमि कटाव रोकने में मदद करते है। इसका पौधा 30 से 45 सेमी ऊँचा अनेक शाखाओं युक्त होता है। गहत मुख्यतः रूप से असिंचित दशा में उगाया जाता है और जहां तक उत्तराखण्ड में गहत उत्पादन है यह परम्परागत दूरस्थ खेतो में उगाया जाता है क्योंकि गहत की फसल में सूखा सहन करने की क्षमता होती है, साथ ही नाइट्रोजन स्थरीकरण (फिक्ससेशन) करने की भी क्षमता होती है। इसकी खेती के लिये 20 से 30 डिग्री सेल्शियस, जहाँ 200 से 700 मिलीमीटर वर्षा होती है, उपयुक्त पायी जाती है। गहत में प्रोटीन तथा कार्बोहाईड्रेड की प्रचूर मात्रा होने के कारण आज गहत का उपयोग सम्पूर्ण विश्व में विभिन्न खाद्य तथा पोषक पदार्थों के रूप में किया जा रहा है। इसके बीज में कार्बोहाईड्रेड 57.3 ग्राम, प्रोटीन 22.0 ग्राम, फाइबर 5.3 ग्राम, कैरोटीन 11.9 आई0यू0, आयरन 7.6 मिलीग्राम, कैल्शियम 0.28 मिलीग्राम, मैग्नीशियम 0.18 मिलीग्राम, मैग्नीज 37.0 मिलीग्राम, फोस्फोरस 0.39 मिलीग्राम, कॉपर 19.0 मिलीग्राम तथा जिंक 0.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम तक पाये जाते हैं।

पहाड़ के खाने में शरीर की जरूरत के लिए पर्याप्त ऊर्जा और पोषण के साथ-साथ मौसम का भी विशेष ध्यान रखा गया है। अपने अनुभव से हमारे पूर्वजों द्वारा गर्मियों के लिए तय किया गया भोजन ठंडी तासीर वाला है, जो पौष्टिक होने के साथ सुपाच्य भी होता है और मन को शीतलता पहुंचाने वाला तो है ही। ठण्ड के मौसम के लिए जिस किस्म के भोजन को विकसित किया गया है वह पर्याप्त कैलोरी और पौष्टिकता देने के अलावा गर्म तासीर वाला भी है। जाड़े के मौसम में पहाड़ में खाई जाने वाली दालों में से एक है गहत या गौथ। बस्वाद एवं पौष्टिकता से लबरेज यह पहाड़ की एक ऐसी दाल है जो औषधीय गुणों से भरपूर तो है ही, इससे अनेक प्रकार के लजीज व्यंजन भी तैयार होते हैं। पहाड़ी जनमानस अलग-अलग तरह से गहथ की दाल को प्रयोग में लाते है।
दाल:
गहथ की दाल बेहद स्वादिष्ट होती है और इसे बनाने का तरीका भी बेहद आसान है। सबसे पहले गहथ को धोकर उसे भिगोने के लिए रख दें और फिर उबाल लें। इस बीच प्याज, टमाटर व धनिया काटकर रख लें। अब कड़ाही या प्रेशर में तेल गर्म कर उसमें जीरे का तड़का लगाएं और फिर उसमें प्याज-टमाटर मिलाकर अच्छी तरह भून लें। साथ ही स्वादानुसार जरूरी मसाले भी मिला लें। अब उबली हुई गहथ को इसमें मिक्स कर लें। इस बात का ध्यान रखें कि ग्रेवी के लिए गहथ के पानी का ही इस्तेमाल करें। यहां यह बताना भी जरूरी है कि लोहे की कड़ाही में पकाने से इस दाल का स्वाद और बढ़ जाता है।
पटूड़ी (पटोड़ी) या पंटूगी:
पंटूगी या पटूड़ी को आप चाय के साथ स्नेक्स की तरह भी ले सकते हैं। पटूड़ी बनाने के लिए आपको गहथ को भिगोकर रखना होगा। इसके बाद हरी मिर्च को बारीक काट लें। अब भीगी दाल को सिलबट्टे में पीसकर इस पेस्ट के साथ कटी मिर्च, नमक, हल्दी और हल्के मसाले मिक्स कर लें। जब आपका मिश्रण तैयार हो जाए तो तवे को गर्म कर उस पर तेल डालकर फैला लें। इस तेल पर मिश्रण को गोलाई में फैला लें और उसे धीमी आंच पर पकाएं। जब एक हिस्सा पूरी तरह से पक जाए तो उसे पलट लें।

गहथ के भरवां पराठे या (बेड़ुले):
गहथ के भरवां पराठे (बेड़ुले) बनाने के दो तरीके हैं। कुछ लोग कच्चे गहथ (भीगे हुए) के पराठे पसंद करते हैं तो कुछ उबले हुए गहथ के पराठे। कच्चे गहथ के भरवां पराठे बनाने के लिए सबसे पहले भीगी हुई गहथ को सिलबट्टे या मिक्सी में पीस लें। इसके बाद मिश्रण में स्वादानुसार नमक, मसाले और थोड़ा-सा आमचूर पाउडर मिला लें। फिर आटे की गोली में मिश्रण को भरकर भरवां पराठे बना लें। जबकि, उबले हुए गहथ के भरवां पराठे बनाने के लिए आपको गहथ को धोकर भिगोने के बजाय उबालना होता है। बाकी प्रक्रिया उपरोक्तानुसार ही है।
फाणू:
फाणू गहथ की दाल को पीसकर बनाया जाता है, जो खाने में बेहद ही स्वादिष्ट होता है। इसके लिए गहथ को रात में भिगोकर रख दें और अगले दिन इसे सिलबट्टे या मिक्सी में पीस लें। इसके बाद प्याज, टमाटर व धनिया काटकर रख लें और अलग से लहसुन का पेस्ट बना लें। फिर लोहे की कड़ाही में तेल गर्म कर उसमें जख्या का तड़का लगाने के बाद कटी हुई सामग्री और लहसुन का पेस्ट मिक्स कर लें। अब स्वादानुसार नमक और अन्य मसाले इसमें मिला लें। साथ ही पिसी गहथ को भी कड़ाही में डाल लें और कुछ देर तक धीरे-धीरे करछी से हिलाते रहें।
गथ्वाणी:
भरवां रोटी बनाने के दौरान आप गथ्वाणी भी तैयार कर सकते हैं। इसके लिए उबाले गए गहथ का पानी अलग निकालकर रख लें। साथ ही थोड़ा पिसा हुआ मसाला भी तैयार कर लें। इस मसाले और गहथ के उबले पानी को छौंक के साथ दाल के रूप में तैयार कर लें।

गहत औषधीय गुणों की खान:
गहथ तीन पत्तियों वाला पौधा है। इसके बीज में प्रोटीन व कॉबरेहाइड्रेट की मात्र अधिक होती है। अनेक रोगों की रामबाण दवा है। कटु रस वाली, कसैली, पित्त रक्त कारक, हलकी, दाहकारी, उष्णवीर्य और श्वास, कास, कफ और वात का शमन तथा कृमि को दूर करने वाली है। यह गर्म, मूत्रल, मोटापा नाशक और पथरी नाशक है। आयुर्वेद में इसे मूत्र सम्बन्धी विकारों और अश्मरी (पथरी) रोग को दूर करने के लिए पथरीनाशक बताया गया है। गुर्दे की पथरी और गॉल पित्ताशय की पथरी के लिए यह फायदेमंद औषधि है। आयुर्वेद में गुणधर्म के अनुसार कुलथी में विटामिन ए पाया जाता। यह शरीर में विटामिन ए की पूर्ति कर पथरी को रोकने में मददगार है। शरीर से अतिरिक्त वसा और वजन कम करने में कारगर होती है। गुर्दे और मूत्राशय की पथरी को खत्म करने में भी गहथ रामबाण औषधि है।

श्री शम्भू नौटियाल जी के फेसबुक पोस्ट से साभार
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