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मैं पहाड़ बुलाण रोऊ

कुमाऊँनी कविता, मैं पहाड़ बुलाण रोऊ, किले गया तुम यां बाटिक, के बिगाड़ मैल तुमर? Kumauni Poem mountain calling to migrant natives

मैं पहाड़ बुलाण रोऊ
रचनाकार: श्याम जोशी

किले गया तुम यां बाटिक
के बिगाड़ मैल तुमर,

मैले तुमारा नान तन सेंथा
सेंथी पायी बेर ठुल करा 
आपण खुंटा में हिटनी बाँड़या 
किले गया तुम यां बाटिक
के बिगाड़ मैल तुमर,

ताजी हाव तुमको यां मिलीं
ठंड पाणी यांक भल लागुं
फिर ले तुम यां बाटिक गया
किले गया तुम यां बाटिक
के बिगाड़ मैल तुमर,

वांक तुमके सड़ी फल भल लागनी 
यांक बोटोवाक काफूव तुम भूल गछा
हर मौसम म तुमको ताज़ी फल खवउंनु 
किले गया तुम या बाटिक मैंकें छोड़ बेर
के बिगाड़ मैल तुमर,

गर्मी दिना जब तुम शहरों में, 
गरम ले पाका छा तब तुमको मैं याद उंनु
फिर कुंछा हटो दुइ दन पहाड़ जे उनु
किले गया तुम यां बाटिक
के बिगाड़ मैल तुमर,

दुइ दिना लिजी तुम यां उंछा
फिर चढ़ वाई उड़ बेर फर न्हैं झंछा
वां जे बेर फ़ेकबुकम फोटो डाल बेर
आपण प्राण झुंरा छा
किले गया तुम यां बाटिक
के बिगाड़ मैल तुमर,

श्याम जोशी, अल्मोड़ा (चंडीगढ़)
( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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