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हौल्दाराक वां ब्या


हौल्दाराक वां ब्या
रचनाकार: दुर्गा दत्त जोशी

मलि कुड़िक हौल्दार बेलि घर ऐ रौ।
किलैकि वीकि भोलें ब्या ठरि रौ।
पाराक पिरमु काक खुशि हैरी।
हौल्दाराक दगड़ि मिलणें ऐरी।

जदिन काककें बरेतिक न्यौत मिलौ।
काकाक दिलमें ठुल्ल लडू फूटौ।
ताल गोंक गुबरि.उर्बि आब ब्यालें घुटुक लगाल।
तब जै बेर ब्या केहूं हौलदार कें बताल।

पहाड़ाक सिदसाद लै य मौक में हुस्यार है जनी।
द्वि चार दिन ब्या बरेतिक कुड़ि ख्या पी जनी।
ढोलि छुलेति वीन बाज तुरि बटी।
बिन पिए अवाज औंनि नें लाटी।

बरक बाप पार वां भतकि रों भुली।
क्वे क्वे बामण लै चाखि राखों पोथी।
हौलदार बिचार इंतजाम में लागि रौ।
सबनकें खवै पिवै बेर बरेति लागि रौ।

कुमाऊँनी कविता, हौलदार बिचार इंतजाम में लागि रौ। सबनकें खवै पिवै बेर बरेति लागि रौ। Kumauni Poem marriage at holdar's home


दुर्गा दत्त जोशी, August 28, 2018

दुर्गा दत्त जोशी जी द्वारा फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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चित्र साभार

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