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आपुंण बसंत

कुमाऊँनी कविता "कसी बतूंनूं में, सिमंटनाक जंगलनाक हाल।  हमार भाग बस यस्सै छू और यई हमर बसंत छु।" Kumauni Poem about Spring season in urban lifestyle

 "आपुंण बसंत"
(रचनाकार: उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम")

खंडित भई गमलन में, नान में या ठुलन में।
माटैकि टुटी मटकी में, लागू य किलकंत छु।
उमें आदू भरी माट में, माटै की तलहाटि में।
आज मन खुश हैरौ, जांडिं कोला सुगंधछु।

नोंच राखि पातन में, आदू उचाहि पुष्पन में।
उज्याण गई बोटन में, मणि जीवन जीवंत छु।
बानरक झुंडन में, बानरक हुड़दंगन में।
गुस्स आपुंण शांत धरूं, आज ऊई मैंस संत छु।

कसी बतूंनूं में, सिमंटनाक जंगलनाक हाल।
आज भोवैकि याथार्थक, यई सब वृतंत छु।
कूणई गुमनाम काक, हमर जीवन यस्से चलूं।
हमार भाग बस यस्सै छू और यई हमर बसंत छु।



©उमेश त्रिपाठी (काका गुमनाम) की रचना।
आपूंकू सपरिवार बसंतक आगमन, बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा कि भौत भौत हार्दिक बधै और शुभकामना 
उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" 22-01-2018
श्री उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" जी की फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी शब्द सम्पदा पोस्ट से साभार

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