
"सांणिं निम्मू"
(रचनाकार: उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम")
आजैकि कुमायूंनी कबिता।
चट चट कर बेर आपुंण हाथ चाट णईं,
कटौर में पत्त नै यस के छू जांणिं।
पास जैबेर जब मैल जो चा तो,
मुख में एगो म्यर टप टप कर पांणिं।
मुख में ऐगो म्यर टप टप पाणिं,
मली बटि पड़ी छी हरियौ धड़ीं।
अहा उ दै में तो मुल लै दगड़ भय,
ऊ भय ठुल निम्मूं दै में संणीं।
उमै मिली भय भांगक लूंण,
पाख में धूप, भीतेर तक लागि गे यसि झुरझुर।
खूबै खा पर नियतै नी भरि मेरि,
सोचि बेरै आजि लै उंणों मुखम पांणिं तुर तुर।
जै जै हमार पहाड़! जै जै उत्तरांचल!
उमेश त्रिपाठी (काका गुमनाम) द्वारा रचित एंव प्रसारित।

उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" 16-01-2018
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