
एक नानि काथ-बडुऔक जाल (मकड़जाल)
लेखिका-ज्योतिर्मयी पंत
हिरदा अच्यालन बरसन बाद आपुण घर लौट बेर रँई.दगड में घरवालि ले छू.पडोसी लोग उनरि कुशल बात पुछण हूँ पुजिगे। आब इतुक सालन बाद अचानक ए रइ ।बंद घर क के हाल हुनाल .घर गिरस्ति शुरू करण में कतुक दिक्कत है जालि, यो सोची बेर सबै आपुण -आपुण तरफ बटी हाथ बटूण हूँ तैयार छि । हिरदा आज बहुतै संकोच करण लाग सबन कै भौते असमंजस है रौछी......कि यो उई हरदा छन जो पैली बटी सबन कै के समझनेर नि भे।बरसन पेली उनर च्यालाल उनन कैं शहर बुले ल्हेछि.फिर उनर ब्या काज शहरन में है गे. उ आपुण गौ-गध्यार ले भूली जे गे ...आब इतु समय बाद उनन के वापस देखि सब ख़ुशी ले भे कि चलौ आब यो फिर वापस ऐगाय..'.देर आयद दुरुस्त आयद कूनी '।.....आपुण घर बार नि भूल ....फिर यां बस जाल कतुक संस्कारी छन पे यनार नानतिन।
हरदा कै देखि बेर सबन के बहुते आश्चर्य जस हैगे इतु कमज़ोर और झकोरि जस है र ईं और उनरी घरवालि तो भौते बीमार और बिस्तर पड़ी है रे छि। .....हरदा क दोस्त चुप नि रे सक ........ब्याल जाणे उनर घर क सब कामकाज पुर है गे सब मिली जुली घर रूणी जस करि गे .....के ले ज़रुरत होलि......धात लगे दी ये हरिया ...? शिब दा बलाण. अचानक हरदा क आँखन बै गंग- जमुन बर्षण लाग .फिर कूँण लागिं...होय रे शिबुआ !तुमन थैं नि कूँलो कै थैं कूँ न?
जब तक हाथ- खुट सलामत छि ।नान्तिनाक नानतिन देखण-पालण छि... तब तक ठीक छि ......पर जस जस बुडियाँ काल आ तस तस आदर -इज्ज़त कम हुण लागि.आब नौकर -चाकर चैनी .....हम बेकार बोझ है गयाँ।
यो मेरी घरवालि एक दिन सीढीन बटी घुरी गे , फिर खाट पड़ी गे....ख्वार में चोट लागी ये कारण आब ककैं भलिक पहचानण में असमर्थ है गे ।.......मै जतुक कर सकूँ यैक जतन करूं ...पर औरन के आफत है गे ...आब तो येक पास क्वे द्वि घडी बैठन ले न्हातन .......यो तो असमर्थ है गे... पर ऊँ लोग तो जाणी -सुनि बेर यकें पहचानन हूँ इनकार कर दिनी। .......यकें तो के फरक नि पड़न पर मैं हूँ तो यो असहनीय यातना है गे .......आपु ण...घर में यस बे इज्ज़ती नि सही गे .....तो मैं आपुनि थाति में वापिस ऐ गयूँ .पर उनर नज़र हमें है ज्यादे यो घर कुड़ी और खेतन में लगी छु.यकें बेच बेर शहर में बसण चाहनी.आब जतु जल्दी हमन है छुटकार हौ तो उनरि मंशा पुरि है सकैं।
अच्यान नानतिन आपुण मतलब पुर हुण तक रिश्त निभूनी ..पर हम लोग जन्मभर मायाजाल में फँसी रूनू.बड़ुए चारि आपु हूँ जाल बुण ल्हिनु। फिर उमें जन्मभर रूंण हूँ मजबूर है जानु। क्वे बताओ धे यो जाल काटणक उपाय?
July 8, 2020

फेसबुक ग्रुप "पहरु कुमाउनी मासिक" से साभार
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