वत्सनाभ (वछनाभ) या मीठा विष-Indian Aconite

वत्सनाभ (वछनाभ) या मीठा विष एक औषधीय वनस्पति है-Vatsanabh or Indian Aconite or Blue Aconite is a toxic medicinal plant

वत्सनाभ (वछनाभ) या मीठा विष-Indian Aconite


हमारे देश का हिमालय क्षेत्र अपनी वानस्पतिक विविधता के लिए जाना जाता है और इस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की जीवनदायिनी औषधीय वनस्पतियाँ पायी जाती हैं।  जिनमें कुछ ऐसी वनस्पतियाँ भी हैं जो सीधे उपयोग किये जाने पर मनुष्य के लिए प्राणघातक विष साबित होती हैं लेकिन विभिन्न औषधीय प्रक्रयाओं द्वारा कुशल विशेषज्ञों के निर्देशानुसार उपयोग किये जाने पर यह जीवन दायिनी जड़ी-बूटियों के रूप में उपयोग में लायी जाती हैं। मीठा विष या वत्सनाभ का पौधा भी उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पायी जाने वाली ऐसी ही एक वनस्पति है जिसे इसके अत्यंत विषैले होने के कारण स्थानीय रूप से मीठा विष के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसके फूल को सूंघने मात्र से ही मनुस्य को मूर्छा आने लगती है।

वत्सनाभ (बछनाभ) या मीठे विष के पौधे भारत में सिक्किम से लेकर उत्तर पश्चिम हिमालय के उच्च हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से 10,000 से 15,000 फुट की ऊंचाई तक पाए जाते है।  वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार भारत में लगभग28 प्रकार के वत्सनाभ की प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिसमें से कुछ विषैली एवं कुछ विषरहित भी होते हैं।  वत्सनाभ जहरीला होने और मीठा विष के नाम से जाने जाने के पश्चात भी यह व्यर्थ की वनस्पति नहीं है।  सबसे अधिक विष वत्सनाभ की श्रृंगाकार जड़ों में होता है और इनका ही औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।  बाजार में दो तरह के वत्सनाभ मिलते हैं, एक काला, दूसरा सफेद।  वास्तव में वत्सनाभ का प्राकृतिक रंग धूसर, पीताभ होता है जिसे सफेद बछनाग (वत्सनाभ) कहते हैं।  वत्सनाभ को रंगकर काला वत्सनाभ बनाया जाता है, जिससे इसमें कीड़े नहीं लगते हैं।  क्योंकि यह उच्च हिमालयी क्षेत्रों में उगता है जहां सर्दियों में बर्फ जमी रहती है इसलिए औषधीय प्रयोग के लिए पौधे को उखाड़कर इसकी जड़ों का संग्रह ग्रीष्म ऋतू में किया जाता है।

वत्सनाभ (वछनाभ) या मीठा विष एक औषधीय वनस्पति है-Vatsanabh or Indian Aconite or Blue Aconite is a toxic medicinal plant

विभिन्न भाषाओं में वत्सनाभ के नाम (Different names of Indian Aconite)

हिन्दी में -      मीठा विष, मीठा तेलिया, बछनाग।
संस्कृत में -   अमृत, वत्सनाभ,क्ष्वेड।
अंग्रेजी में -    Indian Aconite, Blue Aconite, Monk's Hood।
बंगाली में -    काठ विष, मीठा विष।
तेलुगु में -      वसनूभि।
मराठी में -    वचनाग।
गुजराती में - बछनाग।
अरबी में -    विष।
फारसी में -  विचनाग।

वत्सनाभ का वानस्पतिक परिचय (Botanical details of Indian Aconite)

वत्सनाभ (बछनाभ) के पत्र निर्गुन्डी के पतों के समान, 3–6 इंच लम्बे एवं अनेक भागों में विभक्त होते है | फल में 5 खंड होते है एवं पौधे के बीज काले रंग के होते है।  यह Ranunculaceae फैमिली का पौधा है जिसमें जुलाई से अगस्त के महीनों में  बैगनी नीले रंग के फूल खिलते हैं जो 6 से 12 इंच लम्बे एवं रोमश होते हैं।  इसके कुछ फूल द्विरंगी भी होते हैं लेकिन दिखने में बेहद सुंदर इसका पुष्प प्राणघातक भी हो सकता है।  क्योंकि इसके पौधे के विषैले फूलों को सूंघने मात्रा से ही मनुष्य बेहोश हो जाता है।  इसकी जड़ें 1 से 3 इंच लम्बी, 1 इंच मोटी और बाहर से धूसर रंग की एवं तोड़ने पर पीलापन लिए कुच्छ सफ़ेद दिखाई पड़ती है।  जड़ की बनावट बछड़े की नाभि के समान होने के कारण ही इसे वछनाभ या वत्सनाभ पुकारा जाता है और यही इस पौधे का सबसे ज्यादा विषैला भाग होता है।  शायद इसके विषैले प्रभाव के कारण ही इस पौधे के आस पास दूसरे पेड़-पौधे नही उगते हैं।  इस सम्बन्ध में वत्सनाभ के पौधे के बारे में निम्न श्लोक भी प्रचलित है:-
सिन्दुवारसदृक्पत्रो वत्स्नाभ्याकृतिस्तथा।
यत्पार्शेव:न  तरोवृद्धि वत्सनाभ: स उच्यते।।
अर्थात 
जिसकी पत्तियां निर्गुन्डी के समान हो एवं जड़ की आकृति बछड़े की नाभि के समान दिखाई दे। उसके आस–पास और कोई वृक्ष न उगता हो, उसे वत्सनाभ समझना चाहिए।
   वत्सनाभ (वछनाभ) या मीठा विष एक औषधीय वनस्पति है-Vatsanabh or Indian Aconite or Blue Aconite is a toxic medicinal plant
इमेज – wikimedia.commons

यह अति विषैला पौधा होता है और इसकी जड़, पते एवं फूल सभी भागों में विष उपस्थित रहता है।  यदि पालतू पशु इस वनस्पति के पत्ते, जड़ या तना खा लें तो उसकी तत्काल मौत हो जाती है।  इस पौधे में बड़ी मात्रा में अत्यंत विषैले रसायन एल्केलाइड एकोनाइट व स्यूडोएकोनाइटिन पाये जाते हैं।  यह विश्व के सबसे जहरीले पौधों में से एक है और पशु विषाक्तता के लक्षण आमतौर पर  सेवन के 45 मिनट से एक घंटे बाद तक दिखाई देते हैं जिसमें मुंह और गले का सुन्न होना और उल्टी होना शामिल है।  सेवन के कुछ समय पश्चात ही श्वास की गति पहले तेज और फिर मंद होने लगती है और अन्ततः हृदय गति धीमी पड़ती जाती है जिससे जीव की मृत्यु हो जाती है। 

रासायनिक संघटन: इसमें एकोनाइट एवं स्युडोएकोनाइटिन नामक जहरीले तत्व पाये जाते हैं।

गुण: विधिपूर्वक शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ विषनाशक, त्रिदोषनाशक तथा वीर्यवर्धक है।

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति द्वारा इसके विभिन्न भागों को शौधित करके उपयोगी आयुर्वेदिक औषधियों का निर्माण किया जाता है।  जिनका उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार हेतु जैसे – बुखार, सुजन, दर्द एवं प्रमेह आदि में प्रयोग किया जाता है।  इस प्रकार औषधीय परिशोधन के पश्चात चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार एक आयुर्वेदिक औषधि के रूप में ग्रहण जाने पर विभिन्न रोगों में यह लाभकारी सिद्ध होता है
आयुर्वेदिक ग्रन्थ "भावप्रकाश" में कहा गया है कि –
तदेव युक्तियुक्तं तु प्राणदायि रसायनम्।
योगवाहि, त्रिदोषघ्नं बृंहणं वीर्यवर्धनम्।।
अर्थात
वत्सनाभ को युक्ति पूर्वक उपयोग करने से यह प्राण दायक रसायन होता है।  यह योहवाही, त्रिदोष हर, बृंहण व वीर्यवर्धक है।
वत्सनाभ (वछनाभ) या मीठा विष एक औषधीय वनस्पति है-Vatsanabh or Indian Aconite or Blue Aconite is a toxic medicinal plant

वत्सनाभ के औषधीय प्रयोग (Medicinal uses of Indian Aconite):

  1. खांसी और श्वास (कासश्वास) की समस्या: पान के पत्ते (ताम्बूल-पत्र) पर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग बच्छनाग (वत्सनाभ) डालें तथा पकाये हुए अलसी के तेल को इसमें चुपड़कर रख लें।  इसे सुबह-शाम पान की तरह खिलाने से खांसी और दमे की समस्या में लाभ मिलता है।
  2. गले के टांसिल: वत्सनाभ को पीसकर इसके गीले चूर्ण को गले में लेप करने से टांसिल इत्यादि गले के रोगों में यह बहुत लाभदायक होता है।
  3. बुखार (ज्वर) के समस्या: दालचीनी, गंधक, सुहागा और अन्य सुगंधित द्रव्यों के साथ आधे चावल के बराबर की मात्रा में वत्सनाभ को मिलाकर देने से बार–बार आने वाले ज्वर की समस्या में लाभ होता है।  वत्सनाभ को बहुत थोड़ी मात्रा में देने से न्यूमोनिया के बुखार (ठंड लगकर बुखार का आना) में राहत मिलती है।  शुद्ध सुहागा, शुद्ध हींग, शुद्ध किया वत्सनाभ, नागदंती, निर्गुण्डी का रस इन सब पदार्थों को समान भाग में लेकर इसे अच्छी तरह से पीसकर 65-65 मिलीग्राम की गोलियां बना ली जाती हैं। इन गोलियों में से 1-1 गोली रोजाना सुबह-शाम लेने से घाव, सूजन और बुखार में बहुत लाभ होता है।  कपूर, कुनैन और शुद्ध वत्सनाभ बराबर मात्रा में लेकर लगभग 65 मिलीग्राम की मात्रा में सुबह-शाम देने से अभिष्यन्द युक्त ज्वर (बुखार) खत्म होता है।
  4. मधुमेह (शूगर या डाइबिटीज़): 70 ग्राम अखरोट में लगभग 10 ग्राम शुद्ध वत्सनाभ को मिलाकर फिर उसमें से लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक की मात्रा में रोगी को 3 दिनों तक दिया जाता है।   इसके दिन में तीन बार प्रयोग से मधुमेह, भयातिसार (भय के कारण दस्त लगना), कुष्ठ रोग और पक्षाघात (लकवा) आदि रोगों के रोगियों के उपचार में लाभ होता है।
  5. मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट या जलन) होना: शुद्ध वत्सनाभ को आधे चावल के बराबर की मात्रा में रोगी को देने से रोगी को लाभ होता है और मूत्रकृच्छ पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
  6. मूत्रातिसार (पेशाब का बार-बार) आना: जिसको मूत्र बार-बार आता हो और मूत्र न रुकता हो ऐसे रोगी को आधे चावल के बराबर वत्सनाभ का सेवन कराया जाता है।  साइटिका, गठिया (घुटने के दर्द), धनुर्वात (शरीर का टेढ़ा हो जाना) में भी इसको बहुत ही कम मात्रा में देने से लाभ होता है।
  7. शरीर के विभिन्न्ग अंगों का दर्द (पीड़ा): वत्सनाभ का तेल सर्वांग की पीड़ा को मिटाकर सभी प्रकार के दर्द में लाभप्रद होता है।  इसका लेप गठिया की समस्या और छोटे जोड़ों की सूजन पर करने से लाभ होता है।  25 ग्राम जौ कूट किए हुए वत्सनाभ को अलसी के तेल में पकाकर रख लिया जाता है और इस तेल की मालिश दर्द के स्थान पर करने से गठिया और अन्य सभी प्रकार के दर्द में आराम मिलता है।
  8. नाड़ियों की कमजोरी (नाड़ी दौर्बल्यता): नाड़ी कमजोरी में वत्सनाभ लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में सेवन करने से नाड़ी की गति सामान्य हो जाती है तथा नाड़ी कमजोरी के कारण उत्पन्न बहूमूत्र (पेशाब का बार-बार आना), शय्यामूत्र (बिस्तर पर पेशाब करना) आदि विकारों को भी यह ठीक करता है।
  9. सेक्स पावर (कामोत्तेजना) की कमी:  वत्सनाभ को सुहागा में मिलाकर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में सेवन करने से मनुष्य की दीर्घायु, तेजवान और जोशीला होता है और उसकी हृदय की गति व्यवस्थित रहती है।  इसके सेवन से कामशक्ति बनी रहती है और ज्ञानेन्द्रियां भी तीव्र हो जाती हैं। वत्सनाभ का प्रयोग बुखार, मंदाग्नि, गठिया, फोड़े-फुन्सी आदि बीमारियों उपयोगी रहता है।  काली हरड़ और चित्रक 30-30 ग्राम, पीपल 15 ग्राम और सफेद वत्सनाभ लगभग 9 ग्राम लेकर, सबको पीसकर गाय के घी में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लिया जाता है।  इस मिश्रण में शहद मिलाकर 2.5 ग्राम से 3 ग्राम तक की मात्रा रोगी को देने से श्वेत कुष्ठ, दमा आदि रोगों में लाभकारी होता है और मनुष्य की सभी अंगों की शक्तियां बढ़ती हैं।  लेकिन ध्यान रहे कि इसको प्रयोग करने से पहले कब्ज नहीं होनी चाहिए और यदि कब्ज हो तो पहले पेट साफ कर लेना चाहिए।
  10. सूजन: सूजन युक्त बुखार में या कफ प्रधान नये बुखार में वत्सनाभ को थोड़ी मात्रा में बुखार के प्रारंभ में ही दे देने से लाभ होता है।  बच्चों की सूजन में वत्सनाभ एक प्रभावशाली औषधि है।
  11. बिच्छू का विष: वत्सनाभ को घिसकर बिच्छू के काटे हुए जगह पर लेप करने से और साथ ही लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में सेवन करने से धीरे-धीरे बिच्छू का विष उत्तर जाता है।
  12. कुष्ठ रोग: ऐसा माना जाता है वत्सनाभ का प्रयोग अगर 3 महीने तक लगातार किया जाये तो कुष्ठ रोग समूल खत्म हो जाता है।
वत्सनाभ Aconite युक्त आयुर्वेदिक औषधियों के बारे में बता रहे हैं डॉ वीरेंदर मदान

वत्सनाभ विष के लक्षण एवं उपचार (Symptoms and Remedy of Intoxication)

वत्सनाभ के सेवन करने से उत्पन्न होने वाले लक्षण निम्न प्रकार हैं:
इसके सेवन के कुछ मिनटों के बाद ही  विष के प्रारंभिक लक्षण प्रकट होने लगते हैं जिनमें शरीर में दाह, मूर्च्छा आना और हृदयगति मंद होने लगती है।
श्वास की गति पहले तेज और फिर मंद होने लगती है और शरीर का तापकर्म गिरने लगता है।  
पीड़ित के मुंह, होंठ, गले में अंदर में तीव्र जलन, चुनचुनाहट और सुन्नता सी आने लगती है।
उसके मुंह से लार गिरने लगती है और कुछ समय पश्चात व्यक्ति के पेट में दर्द एवं उलटी होने लगती है।
झिनझिनी एवं सुन्नता पुरे शरीर में व्याप्त हो जाती है और उसको देखने से ऐसा लगता है कि उसे लकवा हो गया है।
धीरे धीरे रोगी बेहोश होने लगता है, उसका सर चकराने लगता है, देखने की क्षमता कमजोर हो जाती है और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगता है। 
उसमें खड़े होने व चलने की क्षमता नहीं रहती, उसकी हृदय गति धीमी पड़ जाती है।

पीड़ित का उपचार करने के लिए उसको वामक द्रव्य एवं उत्तेजक द्रव्यों का सेवन करवाया जाता है जिससे उसे तुरंत उल्टी (वमन) होने लगे।  उसके शरीर को गर्म रखने हेतु उसे गर्म कपड़े से ढककर उसके सभी अंगो की मालिश करते रहना चाहिए और तुरंत नजदीकी चिकित्सालय में पहुँचाना चाहिए।

वत्सनाभ (बछनाभ) के औषधीय उपयोग सम्बन्धी चेतावनी:

इस लेख में केवल वत्सनाभ के औषधीय गुणों एवं उपयोगों के सम्बन्ध में जानकारी दी गयी है, इसे किसी भी प्रकार हमारे द्वारा औषधीय या चिकित्सकीय परामर्श ना समझा जाए।  वत्सनाभ एक अत्यंत विषैला पौधा है जिसका प्रयोग विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में होता है।  इसका औषधीय या चिकित्सकीय प्रयोग केवल योग्य विशेषज्ञ चिकित्सक के निर्देशन व परामर्श से ही किया जाना चाहिए।
सन्दर्भ के लिए पढ़ें:

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