कुमाऊं में श्राद्ध से पहले 'हबीक' की प्रथा है।

कुमाऊँ में श्राद्ध से  एक दिन पहले श्राद्धकर्ता को उपवास रखना होता है जिसे 'हबीक' कहते हैं।Habeek is fasting on previous day of Shradh in Kumaon

🔥कुमाऊं में श्राद्ध से पहले 'हबीक' की प्रथा है।🔥

आज मेरे पूज्य पिता के श्राद्ध की पुण्यतिथि है!
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😨जानिए श्राद्ध के अवसर पर 'मधुवाता ऋतायते' वैदिक मंत्र का आह्वान क्यों किया जाता है?😨
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आज ज्येष्ठ शुक्लपक्ष की द्वितीया की तिथि को मेरे कर्मयोगी पिता स्व.श्री धनीराम तिवारी जी के श्राद्ध की पुण्यतिथि है।  कल मेरी मातृतुल्या चाची स्व.श्रीमती देवकी देवी जी के श्राद्ध की पुण्यतिथि थी।  कल मेरे छोटे भाई जय कृष्ण ने चाची जी का श्राद्ध किया। मेरे चाचा-चाची निस्संतान थे इसलिए श्राद्ध की तिथि पर मेरा परिवार नियमित रूप से उन मातृ-पितृ तुल्य धर्मात्मा पितरों का भी श्राद्धतर्पण करता है।

कुमाऊं प्रदेश के लोग मूलतः वैदिक संस्कृति के अनुयायी होने के कारण अपने पितर जनों के श्राद्ध की पुण्य तिथि को अत्यंत श्रद्धा भाव से मनाते हैं। मेरे पिता और चाचा जी अपने समय में अपने पितरों का श्राद्ध बहुत ही आस्थाभाव से करते थे।अपनी पूर्वज परम्परा का पालन करते हुए आज मैंने अपने पिता जी की पुण्य तिथि पर ब्राह्मण द्वारा श्राद्ध तर्पण किया।

हमारे कुमाऊं प्रदेश में श्राद्ध की तिथि से एक दिन पहले 'हबीक' लेने की परंपरा है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध से पहले श्राद्धकर्ता को एक दिन पहले उपवास रखना होता है जिसे 'हबीक' कहते हैं।अगले दिन निर्धारित मृत्यु तिथि को अपराह्न में श्राद्ध तर्पण तथा बाह्मण भोज कराया जाता है।  मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान और तिथ्यात्मक श्राद्ध की तिथि से एक दिन पहले पितर श्राद्धकर्ता के घर कौवे या पक्षी के रूप में आते हैं।  इसलिए इस दिन उपवास लिया जाता है,  कौवे और गाय को भोज्य पदार्थों का ग्रास दिया जाता है।

कुमाऊं के ज्यादातर इलाकों में श्राद्ध के पहले दिन व्रत रखा जाता है ताकि दूसरे दिन,दिवगतं आत्मा को शुद्ध और पवित्र भाव से पक्वान्न और चावलों का पिंड अर्पित किया जा सके। मैंने देखा है कि यह प्रथा कुमाऊं के उन क्षेत्रों में ज्यादा प्रचलित है। जिन क्षेत्रों में धान की खेती होती है, वहां चावलों को एक दिन पहले हबीक के दिन भिगा कर श्राद्ध के दिन उन्हें पिंड बनाकर पितरों को समर्पित किया जाता है।  हबीक के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार भोजन किया जाता है। इसदिन दाल खाने का चलन नही है।  ज्यादातर लोग इस दिन झोई भात खाते हैं।हबीक को कहीं कहीं 'एकाबखत' भी कहते हैं।  'हबीक' संस्कृत हवि, हव्य हविष्य आदि का कुमाऊंनी अपभ्रंश रूप है।  इसी प्रकार 'एकाबखत' एकाभुक्त (एक +अभुक्त) का अपभ्रंश संभव है।

मैं हबीक का उपवास बहुत ही श्रद्धा भाव से करता हूं। अपने माता पिता,चाचा,चाची जिसकी भी श्राद्ध तिथि होती है उनके सत्कर्मों को और उनके द्वारा हमारे परिवार के लिए किए गए कार्यों,उनके संघर्षों और उनकी कर्त्तव्यनिष्ठा को याद करने का यह पुण्य अवसर होता है।  पूरा दिन अपने पितर जनों के द्वारा किए गए कार्यों का स्मरण करता हूँ जिनकी वजह से आज हम भरपूर जीवन का सुख भोग रहे हैं।  मेरा मानना है कि हमारी संस्कृति में जो तीन ऋणों से मुक्त होने की बात कही गई है उनमें से पितृऋण का सम्बंध इन श्राद्धकर्म की गतिविधियों से सम्बंधित है।

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा कभी नहीं मरती। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में अर्जुन से कहा है कि मनुष्य का शरीर भले ही मर जाए, लेकिन उसकी आत्मा अजर अमर रहती है।जीवात्मा मरने के बाद कर्मों के अनुसार अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विभिन्न योनियों में जन्म लेता है।

श्राद्ध’ का अर्थ है जो वस्तु श्रद्धापूर्वक दी जाए- ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।’ आश्विन मास के पितृपक्ष हों या तिथ्यात्मक श्राद्ध की तिथियां, पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्रपौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि देकर संतुष्ट करेंगे। इसी इच्छा को लेकर वे पितृलोक से पृथ्वीलोक में आते हैं। इन श्राद्ध की तिथियों में यदि पितरों को पिण्डदान या तिलांजलि नहीं मिलती है तो वे पितर निराश होकर अपने पुत्र-पौत्रादि को कोसते हैं और उन्हें शाप भी दे देते हैं।धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पितरों को पिण्डदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु,पुत्र पौत्रादि, यश, स्वर्ग, कीर्ति, बल, लक्ष्मी,धन-धान्यादि की प्राप्ति करता है।

दरअसल‚ सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जिसमें श्राद्ध की अवधारणा मात्र एक धार्मिक मान्यता नहीं बल्कि सूर्य के संवत्सर चक्र‚ चन्द्रमा के नक्षत्र विज्ञान और कर्म सिद्धान्त की मान्यताओं पर आधारित एक ब्रह्माण्ड दर्शन भी है।पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे नवीन शरीर को धारण कर लेती है। किन्तु पिण्डदान देने की मान्यता यह बतलाती है कि पूर्वजों की मृतात्माएं पचास या सौ वर्षों के बाद भी वायु में सन्तरण करते हुए चावल के पिण्डों की सुगन्ध को अपने वायव्य शरीर द्वारा ग्रहण करने में समर्थ होती हैं।

मत्स्यपुराण में ऐसी ही जिज्ञासा का उत्तर देते हुए कहा गया है कि वह भोजन जिसे श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मण खाता है अथवा जो अग्नि में डाला जाता है वह पितरों के पास पहुंच जाता है। क्योंकि नाम और गोत्र के साथ उच्चारित मन्त्र श्रद्धा भाव से दी गई आहुतियों या वस्तुओं को संकल्पित पितरों के पास पहुंचा देते हैं। यदि किसी के पितर अपने अच्छे कर्मों के कारण देवता हो गए हैं तो उनके लिए श्राद्ध भोजन अमृत हो जाता है। यदि वे अपने बुरे कर्मों के कारण दैत्य या असुर हो गए हैं तो उन्हें श्राद्ध के अवसर पर दिया गया भोजन आनन्द प्राप्त कराता है। यदि वे पशु हो गए हैं तो वही भोजन घास के रूप में उन्हें तृप्त करता है और यदि वे अपने क्रूर कर्मों के कारण सर्प बन गए हैं तो श्राद्ध भोजन वायु बन कर उनकी सेवा करता है।हिन्दू धर्म में पितरों का श्राद्ध करने की परम्परा उतनी ही प्राचीन है जितना प्राचीन वैदिक धर्म है। ऋग्वेद में श्राद्ध के देवता ‘श्रद्धा’ की स्तुति की गई है। ‘श्राद्ध के अवसर पर पिसे हुए चावलों से जब पिंडनिर्माण किया जाता है तो ऋग्वेद के निम्नलिखित मंत्र का बार बार उच्चारण किया जाता है-
"मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नं सन्त्वोषधी:।।"-ऋग्वेद,1.90.6

ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कुछ ऋचाएं हैं जिनमें 'मधु' शब्द का वारंवार प्रयोग हुआ है।सामान्य लोग यहां 'मधु' शब्द को शहद के लिए प्रयुक्त मानते हैं। किंतु इन ऋचाओं में उसे व्यापक अर्थ में प्रयुक्त किया गया है।'मधु' का अर्थ है यहां मिठास जिससे सुखानुभूति हो या जो आनंदप्रद हो।'मधु' विषयक ये तीन ऋचाएं ऋग्वेद, प्रथम मंडल,सूक्त 90 में क्रम पूर्वक इस प्रकार एक साथ आई हैं-

🔥"मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥6॥"
अर्थात् यज्ञकर्म में लगे हुए, यजमान, को वायुदेव मधु प्रदान करते हैं; तरंगमय जलप्रवाह वाली नदियों से मधु चूता है; संसार में उपलब्ध विविध ओषधियां हमारे लिए मधुमय हों।

🔥"मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः।
मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥7॥"
अर्थात् रात्रि हमारे लिए मधुप्रदाता होवे; और उसी प्रकार उषाकाल, अर्थात् सूर्योदय के पहले का दिवसारंभ का समय,भी मधुप्रद हो; पृथ्वी से धारण किया गया यह लोक मधुमय हो;जलवृष्टि द्वारा हमारा पालन करने वाला पिता द्युलोक (आकाश) माधुर्य लिए हो।

🔥"मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः॥8॥"
अर्थात् वनों के स्वामी (अधिष्ठाता देवता) मधुर फल देने वाले हों; आकाश में विचरण करने वाले सूर्य मधुरता प्रदान करें; हमारी गौवें मधुमय दूध देने वाली हों।

दैवी और प्राकृतिक शक्तियों को 'मधु' शब्द से संबोधित ऐसे वैदिक मंत्र हमारे लिए शुभकामनाएं देने वाले मंत्र हैं, जिनमें नदियों के अमृत तुल्य जलों, वनों, वनस्पतियों, हमें यज्ञानुष्ठान हेतु दुग्ध,दधि,घृत प्रदान करने वाली गौओं तथा सूर्य,और नियम पूर्वक संचालित होने वाली ऋतुओं से प्रार्थना की गई है कि वे सदा अपना अनुग्रह बनाए रखें जिससे कि हमारा जीवन सुखमय, कल्याणकारी और मधुमय हो सके। इस प्रकार श्राद्ध के अवसर पर बोले जाने वाली इन ऋचाओं में सुखद एवं सफल जीवन की कामना का भाव निहित है। इसके अतिरिक्त मानव कल्याण हेतु अग्रसर प्रकृति के विभिन्न घटकों के प्रति कृतज्ञता भाव भी इन ऋचाओं में दिखाई देता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से इन वैदिक श्रुति वचनों का आशय है कि अपने मधुमय सुख के स्रोत को भीतर से फूटने दो। हम सब लोग गांवों में रहने वाले लोग हैं। वहाँ कुओं,नौलों आदि से जल भरने का अनुभव हम् सबको है। परन्तु कुएँ की एक विशेषता है कि जितना पानी उसमें से निकालो उतना ही पानी भीतर से और आ जाता है। तो यह हृदय भी सुख का मधुमय कूप है।आप इससे मधु निकालकर जितना बाहर के प्राणियों की प्यास बुझाओगे, उतना ही सुख का झरना आपके भीतर फूटने लगेगा,उतना ही सुख-स्वरूप परमेश्वर का मधुमय अखण्ड प्रवाह आपके भीतर प्रवाहित होने लगेगा।आपको समूचे ब्रह्मांड के सदस्य होने की अनुभूति होने लगेगी। श्राद्ध के अवसर पर पिंडदान की परम्परा भी इसी मधुमय आनन्द की अनुभूति कराती है। इसलिए इस "मधुवाता ऋतायते" मंत्र की बार बार पुनरावृत्ति की जाती है।

तैत्तिरीय संहिता में देवऋण, ऋषिऋण के साथ साथ पितृऋण चुकाने का भी उल्लेख आया है। छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार देवताओं के समान ही पितृगण भी इस ब्रह्माण्ड व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं इसलिए उन्हें ‘स्वधा’ अर्थात् जल तर्पण देने का विशेष विधान किया गया है –‘स्वधां पितृभ्यः।’ (छान्दो- 2-22-2)

ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो सूर्यवंश के संस्थापक मनु आदि के वंशजों ने पितरों को श्राद्ध की विधि से श्रद्धांजलि देने की परम्परा प्रारम्भ की थी।मनु के वंश में ही उत्पन्न मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने भी सरयू प्रवेश से पहले अपने पूर्वज पितरों की पवित्र भूमि उत्तराखण्ड हिमालय स्थित ‘काषाय’ पर्वत पर देव‚ऋषियों और पितरों का श्राद्ध-तर्पण किया था।अल्मोड़ा में ‘कलमटिया’ नामक स्थान पर वह स्थान आज भी ‘रामशिला’ के रूप में पूज्य है-

“दृश्यते भूतलेऽद्यापि पुण्ये काषायपर्वते ।
तत्र ये वैष्णवा धन्या रामपादाकिंतां शिलाम् ।
पूजयन्ति महाभागास्ते धन्या नात्र संशयः ।
सधन्यः पर्वतो ज्ञेयो यत्र रामशिला शुभा।।”
-मानसखण्ड‚ 52.36–37

दरअसल‚ श्राद्ध की अवधारणा पूर्वज-पूजा के रूप में वैदिक चिन्तन का ही परिणाम है। ऋग्वेद के अनेक मंत्रों में अग्नि से प्रार्थना की गई है कि वह शरीर दाह के उपरान्त मृतात्मा को सत्कर्मों वाले पितरों और देवताओं के लोक की ओर ले जाए (ऋ.10.15.14) बृहदारण्यकोपनिषद् में मनुष्यों‚ पितरों और देवों के तीन पृथक् पृथक् लोक बताए गए हैं। उपनिषदों के काल से ही यह मान्यता प्रसिद्ध हो चुकी थी कि विद्या अर्थात् ज्ञानमार्ग से देवलोक की प्राप्ति होती है और कर्ममार्ग से पितरलोक मिलता है-

‘विद्यया देवलोकः’ ‘कर्मणा पितृलोकः’
-बृहदा‚1-5-16

छान्दोग्योपनिषद् में मृत्यु के उपरान्त जीवात्माओं द्वारा देवयान (उत्तरायण) और पितृयान (दक्षिणायन) इन दो मार्गों से परलोक जाने का वर्णन आया है।

यह मेरे पिता के श्राद्ध की पुण्यतिथि का ही सुफल है कि मैं कल हबीक के दिन से लेकर आज अपराह्न तक अन्य समस्त सांसारिक बातों से विरत हो कर उनके सुकृत्यों का ही केवल स्मरण कर रहा हूं जिनके संघर्षपूर्ण जीवन से मुझे भी संघर्ष के पथ पर चलने की प्रेरणा मिली। वे स्वाभिमानी इतने थे कि किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते थे। स्वाभिमान और संस्कृति के प्रति गौरवशाली होने का स्वभाव मुझे अपने पिता से विरासत में मिला है। मेरे पूर्वजों का पूरा परिवार माता पिता,चाचा चाची मां द्रोणगिरि के परम उपासक थे।नवरात्र में दुनागिरी के दर्शन करना और वहां भोग चढ़ाना उनका नियमित कार्यक्रम था।बचपन में मैं भी उनके साथ पैदल विभाण्डेश्वर होता हुआ दुनागिरी जाया करता था।मेरे माता पिता,चाचा चाची सब मां दुनागिरी से मेरे उज्ज्वल भविष्य की कामना किया करते थे।बचपन से ही अपने माता पिता के ऐसे ही धार्मिक संस्कारों से मुझे द्रोणगिरि शक्तिपीठ पर पुस्तकें लिखने की प्रेरणा मिली।महाराज पवनगिरी जी जब मंगली खान से दुनागिरी मंदिर तक सीढ़ियों के निर्माण कार्य में लगे थे तो मैंने भी अपने पिता एवं चाचा जी की पुण्य स्मृति में दान स्वरूप एक एक सीढी दुनागिरी मंदिर को भेंट की है।आज अपने पिता के श्राद्ध की पुण्य तिथि पर मैं और मेरा परिवार मां दुनागिरी को नमन करते हुए उन पुण्यात्मा को श्रद्धापूर्ण श्रद्धाजंलि अर्पित करता है और मैं अपने कर्मयोगी पिता के चरणों में अपना शीर्षवन्दन करता हूं।

उनका आज्ञाकारी पुत्र
-© डा.मोहन चन्द तिवारी 💐💐💐
 

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