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उत्तराखण्ड में कुमाऊँ अंचल के लोकनृत्य एवं गीत

उत्तराखण्ड में कुमाऊँ अंचल के लोक नृत्य एवं गीत, folk dances and songs of Kumaon region of Uttarakhand, Kumaon ke Loknrutya aur geet

कुमाऊँ अंचल के लोक नृत्य एवं गीत

लेखिका: प्रेमा पांडे

धार्मिक आस्थाओ पर आधारित कुमाऊंनी लोक कला अपनेआप में अदभुत् प्रेरणा लिए दृष्टीगोचर होती है, कुमाऊँ में रहने वाले कुमाऊँनी कहलाते है, इनके पूर्वज राजस्थान, महाराष्ट, गुजरात से आकर यहां बसे थे, यहां पर होने वाले मेलो त्योहारो लोकगीतो तथा अन्य सामाजिक उत्सवो के अवसर पर अत्यन्त उल्लास पूर्वक लोग भाग लेते है, प्रत्येक जाति के स्त्री पुरुष परस्पर स्नेहमय बन्धुत्व भाव से भाग लेते है, देवताओं में शिव, देवियो में दुर्गा काली व नन्दा प्रमुख है।</p> <p>यहाँ के लोक गीत बँधन मुक्त है, दैनिक जीवन से सीधा सम्पर्क होने के कारण वातावरण की रँगीन विविधता और जीवन सँधर्ष की भावनाऐ इसमें एक साथ मुखर हो उठती है, सुख, दु:ख, हर्ष विषाद प्रेम सौन्दर्य और करुणा की भिन्न धार्मिक अनुभूतियों का पूर्णरुपेण प्रतिनिधित्व करते है, धार्मिक भाव प्रधान झोडो़ में अधिकांशत: किसी स्थान या अवसर पर विशेष सम्बन्ध रखने वाले विभिन्न देवी देवताओ के प्रति स्मरण पूजा, विनय आदि की भावनाऐ प्रकट होती है।

झोडा़ नृत्य:

यह गीत सामूहिक रुप से गाया जाता है, इस गीत के साथ साथ नृत्य भी चलता है, गोल धेरे में खडे़ होकर  एक दूसरे से हाथ व कँधा जुड़ाये हुए एक विशेष प्रकार के पग सँचालन के साथ झोडे़ गाये जाते है, इसे स्त्री पुरुष अलग अलग टोली में गाया करते है, इसे झोड़ा झवाडा़ नाम से सम्बोधित करते है, झोड़ा गीत में यह निम्न गीत है:-
खोल दे माता खोल भवानी धरम किवाड़ा,
दी ज्योला निशाण चढूलो तेरा दरबार ए।
पाणी नि जा वै पाणी, भँवर को सीला पाणी नि जा वै।
पाणी छौ भौतै दूर, भँवर को शिला पाणी नि जावै।।

चाँचरी नृत्य:

इस नृत्य की लय झोड़े की अपेक्षा अधिक विलम्बित होती है तथा उसके साथ गाये जाने वाले गीत विभिन्न प्रकार के होते है, इस नृत्य के लिये उपयुक्त अवसर मेले ही प्रमुख होते है, इन नृत्यों के गीतो का विषय धार्मिक आराधना प्राकृतिक प्रेम इत्यादी पर आधारित होते है, छपेली प्रेमियों का नृत्य है और इसमें भाग लेने वाले युगल एक हाथ में दर्पण व दूसरे हाथ में रँगीन रुमाल लिये नृत्य में भाग लेते है, वास्तव में यह तरुणो का नृत्य है, पुरुष महिलाओं के आभूषण वस्त्र धारण कर इस नृत्य में भाग लेते है, हाथो द्वारा की गई भाव भँगीमा ही इस नृत्य की विशेषता है।
सात सुपा झुँगरि कसि कै कुटू देवरी
यो झुगरि भाता कसिकै खाला देवरी।
स्कूल स्कूला कसिकै जाला देवरी।
ना कलम ना दवात कसिकै जाला देवरी।।

छोरी लछिमा तेरि चप्पल टुटैलि।
लौडा मोहना तेरि नौकरी छूटैली।
छोरि लछिमा माछा लागो ध्वीडा़।
लौडा मोहना माछा लागो ध्वीडा़।।
छोरी लछिमा त्यारा खुटा काना।
बूडो़ लछिमा म्याराखुटा पीड़ा।।

भगनौल:

भगनौल कुमाऊं का बहु प्रचलित लोक गीत है, यह लोक गीत गायकों की व्यँग विनोदपूर्ण मनोरँजन रचनाऐ है, इन गीतो को गायक (कलाकार) एकत्रित होकर निश्चित स्थान चुन कर गाते है, ये गायक आशुकवि कहे जाते है, इनकी शैली प्रश्नोत्तर शैली है, गीत के रूप में ही प्रश्न पूछे जाते है, और गीतो में ही उन्है उत्तर दिये जाते है।

हुड़क्याबौल:

यह यहाँ कृषि गीत है ,सामूहिक रुप से खेत में परिश्रम करते हुए लोगो के जीवन सरसता स्फूर्ति तथा उमँग का सँचार करने का यह अत्यन्त सुन्दर माध्यम है,  हुड़क्के के थाप पर श्रम करते हुवे हाथो में अनायास ही याँत्रिक गति आजाती है, प्रमुख गायक विशेष सज्जा के साथ हुड़क्के के थाप देते हुए गीत की एक पंक्ति गाता है, जिसे गुडा़ई करने वाले सभी लोग दुहराते है, आरम्भ में ग्राम देवता (भूमिया )की स्तुति गाई जाती है, सूर्यास्त पर दो तीन छन्दो से मँगल कामना करते हुए प्रधान गायक भूस्वामी को आशीर्वाद देता है।
जीरया जीरया जनरियो गोडा़ई तोपाई,
या ऋतु यो मास भेटनै रया।
गीत के बोल - हुड़क्या बौल।
दै हौ सुफल है जाया देवा हो।
दै हो गौरी का गणेशा देवा हो।।
भूमि का भुमियाला देवा हो।
घाति का घत्याला देवा हो।।
सुफल है जया देवा हो।।

छपेली:

यह एक नृत्य प्रधान गीत है, इन गीतो में पुरुष हुड़का वादक गाता है, तथा नृत्य करता है, और अन्य नृत्य मुद्राओ तथा भाव भँगीमाओ के माध्यम से गीत के भावो को अभिब्यक्त करता है, इन नृत्य गीतो में यौवन का उल्लास जीवन की मधुरिमा  झलकती है, गीतो की एक पँक्ति टेक स्थाई होती है, जिसे गायक दो पँक्ति के अन्तर के बाद दोहराता है यही स्थाई पँक्ति गीत विशेष की थीम कही जा सकती है, एक छपेली की टेक निम्न है:-
तीलै धारो बोला पधानी वे रुमा झूमा।
रुमा झूमा रुमा पधानी वे रुमा झूमा।।
ओ हो न्योला न्योला,
मेरि सोबना दिन दिन यो जोबन जाण लाग्यो।।

ऩ्यौलि या न्योली:

इस गीत पर नैपाली गीत शैली का प्रभाव है, पर्वतीय बालाऐ एकांन्त स्थल पाकर अपने प्रिय की स्मृति में न्योलि छेड़ती है, न्योली में प्रेम पूर्वक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के साथ जीवन के प्रति दार्शनिक भाव की अभिव्यक्ति भी मिलती है, इसमें कहीं औदात्य, कहीं विषाद, कही गहन दार्शनिक तथ्य मुखरित हुए है:-
काटना काटना पौर आयो चौमासक वन।
बगणि पाणि थामि जांछ, नी थामिनी यो मन।।
अर्थात .…...
काटते काटते चतुर्मास का वन पल्लवित हो गया है, बहते पानी का वेग थम गया है, परन्तु यह चँचल मन थम नही सकता।
न्योली
सांझ पड़ी रात घिरी दी बातो निमाण।
म्यर चित साली दिये जाँ तेरो तियांण।।
पार भीडा़ कांकड़ मारो शीशै की गोली लै।
मेरो हियो भरि ऊँछौ तेरी मीठी बोली लै।।

इस प्रकार कुमाऊँ में ऋतुओं से सम्बंधित गीत भी प्रचलित है, चैती गीत, सँस्कार गीत, देवी गीत, देवताओं के गीत,  मेले त्यौहारो और अन्य विषयो से सम्बन्धित गीतों की तो बहुुल्यता है, मँगल गीत बाल गीत गीतो का भी अनूठा स्थान है, हुड़का, मुरली, बिणाई, बांसुरी यहाँ के गायक सखा है, इन गीतो के साथ साथ नृत्य स्वभाविक रुप से जुड़ा हुवा है, इन गीतो में हरे भरे कुमाऊँ के जीवन की सरस झांकी भी मिलती है, बसन्तोसव की धूम मची है, दीदी भुलि मिल कर लोक गीतों की सरसता में खोई हुई है, इन चपल बालाओं की सुरीली लय में गूँजते है ये शब्द-
बसन्ती छु आज ऋतु है जो हम।
कँठ हमर ताल दीछ मन नाचूं छमाछम।।
उनका मयूर मन नृत्य करने लगता है, इस उमँग को वह अपने जीवन में समेट लेना चाहती है, उनके जीवन में भी बहार मन छा जाए ऐसी कामना करते हुए वह गाने लगती है।
आइगे बसंत ऋतु छाइगे बहार।
डाई बोटी फूली गई गाड़ धार।।

एक ओर उमंग उल्लास है तो दूसरी ओर निराशा विवाद है, एक ओर मिलन है दूसरी ओर विरह, कही आनन्दोसव विरही हृदय के लिये कसक का कारण बन जाता है, ऐसी अवस्था में सुकुमार हृदयों के दु:ख सो विचलित उदगाऱों की मार्मिक अभिव्यक्ति इन गीतो में हुई है, प्रेयसी का प्रिय से विछोह उत्सव के अवसन पर किसी लाडली बिटिया का मैत (पीहर ना आ सकना, माँ के पास न पहुँच पाने वाली लाड़िली बिटिया की व्यथा इन गीतो में पिरोई हुई है।
दिन न्हैगो धार मजी मन न्हैगौ मैत।
सूर्यास्त हो रहा है, बेचारी माँ के पास न जा सकी, उसके प्राण सूखे जा रहे है, पीहर की मधुर स्मृति में मन विचलित हो रहा है, उधर माँ की ममतामयी आँखे बेटी की बाट जोहते जोहते लाल होगई है, अनायास माँ के मुँह से ये बोल फूट पड़ते है।
बाटि लैेेरे आँखि, नि आई चेली ।
मैता का स्वैणा में, कसिक सेली चेली।।

विरह में भला क्या आनन्द क्या उत्सव, क्या जीवन का सुख, प्रियतम परदेश में है, विरहिणी के बसँन्तोत्सव के सारे आनन्द निस्सार है, प्रिय प्रवास की राधा की भाँति उड़ जाना चहती है अपने प्रियतम के पास।
सुवा मेरा परदेश लागिरौ निसास।
पँछि बणी कसि उंडू मै सुवा का पासा।।
किसी नवीन स्त्री को नवीन रुप में सम्बोधित रुप में गाये जाते है, ये विरह मूलक गीत है, और जीवन चिन्तन की प्रधानता होने के कारण इनके लम्बे खिचाव वाले स्वर बहुत करुण व अत्यन्त मर्मस्पर्शी हुवा करते है।

इन लोकगीतो की गूँज कुमाऊँ के कर्मठ जीवन में श्रम से कातर क्षणो में एक अद्भुत उमँग का सँचार करती है, जीवन का कोई पक्ष कोई कोना कोई क्षेत्र अछूता नही है, सभी पक्ष अपनी पूर्णता के साथ इन लोक गीतो मेंं समाये हुए है, सामाजिक पर्व, धार्मिक अनुष्ठान राष्ट्रीय उत्सव सभी अवसरों में इनका अनूठा स्थान है, इन गीतो से सारा वातावरण संगीतमय होजाता है, ग्वालों की मुरली का मधुर स्वर खेतो में काम करती रमणियो के गीत में मिल जाता है, घसियारी के कोकिल कँठ से सँगीत का निर्झर फूट पड़ता है तथा पास के बहते हुए झरने की कल कल ध्वनी उसमें समा जाती है, सदियां बीती युग बदला पर वहाँ के पनघट पर गागरे उसी भाँति चमकती रही है।


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