सरुलि बोजि - कुमाऊँनी कहानी

सरुलि बोजि - कुमाऊँनी कहानी,ek pahadi nari ki dastan,story of a pahari lady in kumaoni

सरुलि बोजि - कुमाऊँनी कहानी

लेखक: हीराबल्लभ पाठक 'निर्मल'

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ब्याल् बखत् चाख् में भैबेर् तमाखु पिणौछी कि सरुलि बोजि ऐ गे, मिल् कौ नमस्कार बोजी कसिक् आछा। बोजिल् कौ द्योरा सोचनौयू अलैबेर् उतरैणि नांण हरद्वार जै ऊनूं, भैरवदतदत, बिसन ज्याड्ज्यु और रधुलि ज्यु करांक् लै जांण लै रयीं त् दगड़ लै भल् हैरौ ।... मिल् कौ हो होइ पै किलै नैं जै आओ तुम लै। फिरि बोजि कूंण लागी , ....पै द्यौरा तुम हजारेक् रुपैं दि दियौ और चार-पांच दिन् जतू लै लागल् पै तुम सितणां ल्हिजी म्यर् घर न्है जया, यौ घरैकि दुहरि चाबि छु कनैं चाबि म्यर् तरफ्यां सरकै दे। मिल् अपंणि घरवाइ तैं कौ अवे जरा यौ बोजि कैं एक हजार रुपैं दि दे, तीर्थ नांण जानई। घरवाइल् हजार रुपैं सरुलि बोजिक् हात् में धरि दीं। ...अच्छ्या हिटनूं पै तैयारी लै करणींछ् भोल् रात्तिपार् जाणौं बल ,यस् कनैं सरुलि बोजि न्है गाय्। सरुलि बोजि कि कहानि लै ऐस्सी भै कि, ब्या करिया चार बरस बाद हेम दाज्यु (सरुलि बौजिक् दुल्हौ) तीन दिनैंकि बिमारी बाद अचाणंचकै पल्लौक् साधारि ग्याय्। बीसेक् बरसैकि सरुलि बोजि बिधौ है गे, नान्तिन् के नि भ्या। बीक् बाबु आयीं उनूल् भौत् कौ च्येली हिट पै म्यर् दगड़, यां कसिक् रौली। पर सरुलि बोजि ल् ना कै दे, और कूंण भैटी कि जस् लै म्यर् भाग पार् हौल् भुगतूल पै , बाबू तुम जाओ घरै हैं मेरि फिकर कत्तई झन् करिया। सरुलि बोजि भौत्तै मिलनसार और गुणी महिला भै, सब्बूं कै सुख दुख में आघिल् रुनेर् भै। द्वि-चार बरस जांलै ब्या-काजन् में लोग जरा सरुलि बोजि दगै बिधौ छु कनैं दूरी बणैंछी, पर पछी-पछी बिना सरुलि बोजि क्ये कामैं नि हुनेर् भ्यौ। यौ हिसाबैल् सरुलि बोजि सबूंकि भलि और हितैषी बणि गे, और आज उनरि उमर चालीसेक् बरसैकि है गे हुनैलि। कै कै नान्तिन् हुंण पार् जच्चा-बच्चा कि सारी जिम्मेदारी सरुलि बौजिक् भै। नईं दुल्हैंणि कैं स्यो-सलीक् और व्योहार सिकौंण लै वीकै जिम्म भौय्। आब् छटूं दिन सरुलि बोजि उतरैंणि नै बेर घर ऐ ग्याय् । और द्विचारेक हरद्वार बटि उगलै माव् और परसाद् ल्हीबैर् हमर घर ऐ ग्याय्। मिल् कौ बोजि नमस्कार ऐ गोछा हरद्वार बटि। ....होई द्योरा पुजि गयूं पै राजि खुशि ऐ गयूं भौत्तै इच्छा की गंङज्यु नांणैंकि पुरी गे आज। एक दिन् लछीदा कि घरवाइ (बतीस बरसैकि भै) कैं पीड़ लैगे, गौं क् द्वियेक् सैंणी जो सुए काम ज्याणनेर् भाय् उनूकैं बुलायी गोय् और सरुलि बोजि लै ऐ गे, पैल्-पैल् भौ कि पीड़ लै भौत्तै हुनेर् भै पै, फिरि द्वी-तीन घंटे कि परेशानी बाद भौ त् सकुशल है गोय् पर कितुलिक् (लछीदाकि घरवाइ) परांण न्है गाय्। आब् कां त् खुशिक् माहौल हुंण चैं जी, पर वां डड़ाडड़ पड़ि गे। खैर भौ कैं त् सरुलि बोजिल् समाई ले और बकाइ लोग रीतै तीथ करणक् इन्तजाम पार् लै गाय्। भगवान् ज्यु कि महिमा लै अपारै भै कूंछा सरुलि बोजिल् ऊ भौ तैं गरम पाणिल् पोछि-पाछि अपंण हिकौव पार् लगाया त् बोजि कैं कुछ अणकस्सै जस् आभास अपंणि छाति में भौय् और उनूल् ऊ भौ तैं अपंणि छाति पार् लगे दे, और भौ चुपचाप उनरि छाति बटि दूद् घटकूंण लै गोय्। उथां लछीदाल् लै घरवाइक् पिपव् पाणिकि करम- किरी पुरि करि दे। आब् सवाल भौय् कि यौ भौ कैं को समावौल्? तब पधान अमरसिंह सिंह ज्युल् गौं क् सयाण सैणि-मैंसुकि पंचैत् बलै और यौ सवाल् सब्बूं सामणि धरि दे। आब् जतू मुख उतू बात् कैल कौ लछीदा कैं दुहर् ब्या करि ल्हिण चैं, कैल् कैल् कौ क्वे गोद ल्हिलियो भौ कैं, यतुक् में दुरुग काकि जो सबन् है ज्यादे उमरैकि भै, उनूल् कौ कि मेरि बात् दगड़ अगर सब्बै राजि छा त् लछी और सरुलि कैं घर बसै ल्हीण चैं, किलैकि यौ जो भौ छू, वीकैं गोद में लेते ही सरुलिक् छाति में आफ्फी-आफ्फी दूद् पनिपि गो, ये में लै क्ये न क्ये भगवान् ज्यु कि इच्छा हुनैलि पै, और उसिक् लै एक्कै बिरादरिक् भाय् और उमर् में लै बराबरी छीं, म्यर् विचारैल् क्ये हर्ज न्हां। दुरुग काकि कि बात सुणबेर् सब्बै एक दुसरौक् मुख चाहिए रै ग्याय्। जरां देरक् ल्हिजी चुणबन्द है गे, तब पधान ज्यु बलाय कि क्यलै रे लछिया और सरुली तुम यौ बात में राजि छा। तब दुरुग काकिल् कौ नैं हो पधान ज्यु ऐसिक् नैं तुम लछी तैं अलग ल्हि जै बेर् पुछौ और मैं सरुलि ब्वारि तैं यकलै में पुछूल्। सब्बू लै कौ हो होइ यौ सई रौल्, तब थ्वड़ देरकि मंत्रणा बाद द्वियै राजि है ग्याय्। तब पधान् ज्युल् कौ कि पोरूं हैं सब लोग् देवी थान् में मिलौ वांई सब रीत पुरि करी जालि। द्वी दिनैं बाद देवी थान में सब इकट्ठ है ग्याय् सब्बूं है पैली धर्मानंद पंडिज्यु क् निर्देशन् में लछीदा और सरुलि बोजिल् एक दुहराक् गाव में फूलों कि माव् हाली और फिरि ऊ भौ क् नामकरण करी गोय, पंडिज्युल् राशिक् आंखर् "म" बता। तब दुरुग काकिल् कौ कि मिलाप चंद्र नौं धरौ, किलैकि येकै कारण इन द्वीनूक् मिलाप है रौ। और भगवान् ज्यु कि किरपाल् नान् भौ कैं इज मिलि गे, लछीदाल् कैं सैंणि और सरुलि बोजि कैं मैंस मिलि गोय् तब सब्बै अपंण-अपंण घरां हैं न्है गाय्। (तबै कूनीं मन चाहे होत नहिं, प्रभु चाहें तत्काल) .... दुहर् दिन सरुलि बोजि मिलि बैठी कूंछा, मिल् कौ अहो सरुलि बोजी तुमर् हरद्वार नांण सुफल् है गो पै, ...तब सरुलि बोजि सरमानैं-सरमानैं कुंण लागीं, चुप राओ द्योरा तुमलै भौत्तै उस् मैंस छा हो।

(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार

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1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय पाठक जी आज ३०दिसम्बर२१को सरुली बौजी पढ़ा ‌कहानी पढ़ते वक़्त ऐसा महसूस हो रहा था मानो कुछ दिन पुरानी कहानी (जिसके किरदारों के असली नाम बदल कर) कोई बुजुर्ग नई पीढ़ी को सुना रहा हो।

    भौं तै बढ़िया कथा लिखी छः हो गुरु तूमि ले।
    पाठक ज्यू भौत भौत धन्यवाद!
    ❤️💐🙏

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