कत्यूरी शासन-काल - 1

कुमाऊँ में कत्यूरी शासन-काल,History of Kumaun,Katyuri dynasty in kumaun,kumaon mein katyuru shasan,kumaon ka prachin itihas

कुमाऊँ में कत्यूरी शासन-काल - 1

पं. बदरीदत्त पांडे जी के "कुमाऊँ का इतिहास" पर आधारित

वर्तमान में कुमाऊँ का जो इतिहास उपलब्ध है उसके अनुसार ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश राज से पहले कुछ वर्षों (१७९० से १८१७) तक कुमाऊँ में गोरखों का शासन रहा जिसका नेतृत्व गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा ने किया था और वह पश्चिम हिमाचल के कांगड़ा तक पहुँच गया था।  गोरखा राज से पहले चंद राजाओं का शासन रहा।  अब तक जो प्रमाण मिलते हैं उनके अनुसार कुमाऊं में सबसे पहले कत्यूरी शासकों का शासन माना जाता है।  पं. बदरीदत्त पांडे जी ने कुमाऊँ में कत्यूरी शासन-काल ईसा के २५०० वर्ष पूर्व से ७०० ई. तक माना है।

पं. बदरीदत्त पांडे जी मानते हैं कि वर्तमान में कूर्माचल या कुमाऊँ उन परगनों का समूह है, जो चंद राजाओं तथा बाद में ब्रिटिश राज के अंतर्गत आये।  विस्तृत कत्यूरी शासन के छोटे-छोटे खंड राज्यों में विभाजित हो जाने के बाद चंदों शासकों द्वारा फिर से छिन्न-भिन्न राज्य को एक शासन प्रणाली, एक शृंखला तथा एक छत्र राज्य के रूप में पुनर्गठित किया।

पं. बदरीदत्त पांडे जी के अनुसार कत्यूरी राजाओं की राजधानी पहले जोशीमठ में थी और बाद को वह कार्त्तिकेयपुर में स्थानांतरित हो गयी थी।  उस समय कहा जाता है कि कत्यूरी राजाओं का राज्य विस्तार काबुल से लेकर पूर्व में सिक्किम तक था।  ऐसा कहा गया है कि दिल्ली, रोहिलखंड आदि प्रान्त भी कत्यूरी राज्य शासन की सीमा के अंदर थे।  इसका जिक्र ब्रिटिश पुरातत्त्ववेत्ता श्रीकनिंघम ने भी अपने उल्लेखों में किया है।  पर कुमाऊँ ने कूर्माचल के रूप में विशेष प्रसिद्धि चंद राजाओं के शासन में ही पाई।

पं. बदरीदत्त पांडे जी लिखते हैं कि कुमाऊँ क्षेत्र के सम्बन्ध में महाभारत सभापर्व अध्याय २७, २८, २९ तथा ५२ में लिखा है कि जब युधिष्ठिर महाराज ने अपने प्रतापी भाई भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव को विजय के लिये भेजा, तो उस समय उनका युद्ध कूर्माचल क्षेत्र में कई जाति के क्षत्रियों से हुआ था और परास्त होने पर वे लोग राजसूय यज्ञ में नज़राने लेकर गये थे।  पर विस्तार से उन क्षत्रियों राजाओं के वंश का ठीक-ठीक परिचय वहां पर नहीं दिया गया है।

पं. बदरीदत्त पांडे जी ने लिखा है कुछ ताम्रपत्रों व शिलालेखों से यह ज्ञात होता है कि लगभग २६०० वर्ष पूर्व सूर्यवंशी कत्यूरी राजाओं का राज्य कुमाऊँ क्षेत्र में था।  कुछ लोगों के अनुसार यह भी कहा जाता है  कि अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं का राज्य-विस्तार किसी समय  कुमाऊँ क्षेत्र तक था और कुमाऊँ उनके उत्तर-कौशल प्रान्त में शामिल था।  बाद में कत्यूरी राजाओं के शासन-काल में यह राज्य अलग हो गया।  कत्यूरी राजाओं का राज्य नैपाल से काबुल तक रहा है, और यह भी कहा जाता है कि सम्राट वासुदेव के पुत्र सम्राट् कनकदेव काबुल में मारे गए थे।  यह बात प्रायः निर्विवाद रूप से मानी जाती है कि कत्यूरी राजाओं का राज्य बड़ा प्रभावशाली हो गया था।  पर वे खस राजाओं के पहले यहाँ थे, या उन्होंने खस-राजाओं को जीतकर कत्यूरी-साम्राज्य स्थापित किया, इसका ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सका है।

पं. बदरीदत्त पांडे जी ने कुमाऊँ का इतिहास में भारतवर्ष के प्राचीन निवासी के बारे में डोम या दस्यु (तत्पश्चात शिल्पकार व हरिजन) के लिए लिखा है कि ये भारतवर्ष के प्राचीन निवासी माने जाते हैं।  उनके पूर्व यहाँ कौन लोग रहते थे, और इनकी शासन प्रणाली आदि के बारे में भी कुछ उल्लेख नहीं किया है पर कहा है कि कुछ ज्ञात नहीं है। इन लोगों को खस जाति ने हराकर अपनी प्रजा बनाया या कत्यूरियों ने इन्हें हराया, तत्पश्चात् खस-जाति के लोग यहाँ आये यह स्पष्ट नहीं है।  पर इस बारे में अनुमान यह दिया है कि कत्यूरियों से भी पूर्व यहाँ खस-जाति के लोग रहते थे, क्योंकि महाभारत में उनका यहाँ होना लिखा गया है।  महाभारत की तिथि ५००० वर्ष की है। डॉ० लक्ष्मीदत्त जोशी भी कहते हैं कि खस-जाति के लोग आर्य-जाति के हैं--
For the pur poses of this study it is sufficient to say that the Khasas settlled in these hills appear to represent an early wave of Aryan immulgiants or a prople whose features & language were very much like those of the Aryans.
__ Khasa Family Law p. p. 26-27

उनके अनुसार खस जाती के लोग वेदों के बनने के पूर्व यहाँ आये। बाद में कत्यूरी राजाओं ने अयोध्या से आकर उनको जीता और अपना राज्य यहाँ स्थापित किया। अनुमानत: खस राजाओं का शासन यहाँ २-३ हजार वर्ष तक रहा।  उनके शासन-काल का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं, पर कई ताम्रपत्र ईसा से कई शताब्दी पूर्व के हैं।  उसमें इनके अपने राज्यकाल के संवत् हैं, और जो प्रत्यक्ष में प्रचलित शाके व संवत् से भिन्न हैं।

ऐसा भी माना गया है की कत्यूरियों के शासन के मध्य में कुछ समय के लिये यहाँ शक व हूणों का राज्य भी रहा है, पर यह बहुत समय के लिए नहीं रहा था। बाद में कत्यूरी-साम्राज्य के छिन्न-भिन्न होने पर बाहर से चंद्रवंश के चंदेले राजपूत यहाँ पर आये।  उन्होंने यहां चंद वंश के रूप में लगभग १००० वर्ष तक राज्य किया।  कहा जाता है कि बीच में दो-ढाई सौ वर्ष कई खस-राजा भी राज्य करते रहे।  पश्चात् २५ वर्ष तक कुमाऊँ क्षेत्र गोरखा राज के अंतर्गत भी रहा जिसके बाद गोरखों को पराजित कर सन् १८१५ में अँगरेज़ लोग यहाँ आए और १९४७ तक यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के आधीन रहा।

पं. बदरीदत्त पांडे जी कुमाऊँ का इतिहास में लिखते हैं की शूद्र-जाति के भी एक बार कुमाऊँ में राजा होने किंवदन्ती प्रचलित है।  किन्तु इसका प्रमाण मात्र इतना ही है कि कुमाऊँ में एक चंडालगढ़ उर्फ चमरकोट-नामक एक पहाड़ी चोटी है।  कहते हैं कि वहाँ कुछ समय तक (कोई तो कहते हैं कि केवल ढाई दिन तक) एक डोम राजा ने राज्य किया था।  उस राजा के बारे में प्रचलित है की उसने अपने राज्य में चमड़े का सिक्का चलाया था।

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