गोस्वामी जी के गीतों में क्षेत्रीय एकता का संदेश


गोस्वामी जी के गीतों में क्षेत्रीय एकता का संदेश


(गोपाल बाबू गोस्वामी जी हमारे उत्तराखण्ड राज्य के सबसे लोकप्रिय लोकगायक रहे हैं, अपने गीतों में उन्होने पहाड़ की संस्कृति तथा सौन्दर्य के साथ ही उत्तराखण्ड राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की विशेषताओं को अपने सुमधुर स्वर के माध्यम से स्थान दिया है।)

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हर कलाकार अपनी कला के माध्यम से जनता का मनोरंजन तो करता ही है पर उसके साथ ही वह समाज को कुछ ना कुछ संदेश अवश्य देता है। कुमाऊनी के प्रसिद्ध लोकगायाक गोपाल बाबू गोस्वामी जी एक महान गायक व गीतकार होने के साथ-साथ उत्तराखण्ड के कुमाऊं एवं गढ़वाल अंचलों की एकता के प्रतीक भी हैं। अपनी रचनाओं उन्होने इस पहाड़ी प्रदेश के दोनों अंचलों को अपने गीतों में बराबर मह्त्व दिया है। इस मामले में वह अपने समकालीन या आजकल के गायक/गीतकारों से अलग नजर आते है जो एक क्षेत्र विशेष तक सिमट कर ही रहे हैं। अब आप उनके इस गीत को ही देख लिजिए:

हिमाला को उंचा डांना, प्यारो मेरो गांव,
हिमाला को उंचा डांना, प्यारो मेरो गांव,
छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं ।
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यो भुमि जनम मेरा, माधोसिंह मलेखा
यो भुमि जनम मेरा, माधोसिंह मलेखा,
गबर, चन्दर सिंह, आजादी का पैदा.
मिटायो जुलम तैको, दिखायो उज्यावो - २
छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं॥
छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं॥



अपने उक्त गीत में गोस्वामी जी ने दोनो ही अंचलों को बराबर महत्व दिया है। तथा आजकल उनके इस गीत की पंक्ति "छबीलो गढ़देश मेरो, रंगीलो कुमाऊं", उत्तराखण्ड राज्य की पहचान के रूप प्रयोग की जाती है।

इसी तरह गोस्वामी जी के इस देवी भजन की पंक्तियां देखिये, उन्होने किस प्रकार उत्तराखण्ड की प्रत्येक शक्तिपीठों को अपने भजन की पंक्तियों में पिरोया है:
दुर्गा भवानी, सुफल फलीए माँ, तेरी खुटी परणामा, छाई करिए माँ । -२

हे...... दूनागिरि शेरावायी, कायीगाड़ै की काली, दूनागिरि शेरावायी, कायीगाड़ै की काली।
थिरचौरै अगनेरी की देवी, करी दिये छाई, देघाटै की माता रांणी, मानिलै भवानी ।
गर्जिये उपटा देवी, माता शेरावायी॥
चन्द्रबदनी सुफल है जये, मैया.., छाई करिए माँ
कालीमठै की काली, तू लाज धरिये मां।
कालीमठै की काली, तू लाज धरिये मां।
दुर्गा भवानी, सुफल फलीए माँ, तेरी खुटी परणामा, छाई करिए माँ ।-२

हो ..... मनसा देवी हरिद्वारै की, मनसा देवी हरिद्वार की, देवी धुरै की बाराही।
तेरी खुटी हाथ जोड़नु, धरि दिये पत्ती।
गंगोली की महाकाली, गुरना की.. भवानी।
रक्षा कर दिए माता, हे शेरावायी।
हे दुर्गा भवानी, तू छाई करिए माँ, तेरी खुटि परणामा, तू छाई करिए माँ। -२


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गोस्वामी जी का यह प्रसिद्ध माता भजन देखियेगा .......
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जै मय्या दुर्गा भवानी, जै मय्याऽऽऽऽऽ..............

तेरी सिंहै की माता सवारी-२,
हाथ चक्र सुदर्शन धारी,
डाणा-काना में है रौछ वास -२,
पुर्णागिरी में जली रे जोतऽऽऽऽऽ
जै मय्याऽऽऽऽऽऽऽ...........................................

तेरी जैकार माता उपटा -२
तेरी जै-जै हो देवी का धुरा,
तेरी जैकार माता उपटा,
तेरी जै-जै हो देवी का धुरा,
तेरी जैकार माता गंगोली,
तेरी जैकार कायगाड़ काली
जै मय्याऽऽऽऽऽ ............................

दूनागिरी की सिंहवाहिनी-२,
तेरी जैकार चन्द्रबदनी,
दूनागिरी की सिंहवाहिनी,
तेरी जैकार चन्द्रबदनी,
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तेरी जैकार हे माता नन्दा,
तेरी जैकार देवी मानिला,
तेरी जैकार हे माता नन्दा,
तेरी जैकार देवी मानिला,
जै मय्याऽऽऽऽऽ..............................




ऎसे ही गोस्वामी जी ने कुछ गढ़वाली गीत भी गाये हैं।
गढ़वाली की प्रसिद्ध लोकगाथा "रामी बौराणी" को अपने ओजपूर्ण स्वर में गाकर उन्होने इस गाथा को जैसे अमर ही कर दिया है।



इस प्रकार हम देखते हैं कि गोपाल बाबू गोस्वामी जी एक सुरीली आवाज के धनी गायक (हाई पिच में अपने गीतो से वो सारे श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे), अच्छे गीतकार, संगीतकार होने के साथ-साथ पहाड़ की एकता के लिए भी हमेशा प्रयत्नशील रहे थे। उन्होने अपने गीतों में कुमाऊं तथा गढ़वाल अंचल को बराबर महत्व दिया है।

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4 टिप्पणियाँ

  1. जोशी जी ,
    गोपाल बाबु पहाड़ के गायकों में सर्वश्रेष्ठ थे। उन्होंने हर तरह के गीत गए और मुझे सभी पसंद हैं। मैं जब भी उनके गीतों को सुनता हूँ तो मुझे पहाड़ याद आने लगता है। दिल्ली की इन गर्मियों में तो ये याद और भी प्रबल हो उठी है। एक सुन्दर लेख के लिए धन्यवाद।

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  2. नमस्ते,
    ब्लाग पुराण में देखें
    http://www.akshatvichar.com

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  3. gopal babu goswami hamare uttrakhand ki saan rahe or unke gane dil ko chu jane wale the un me wo mahan kala purv se hi nirdharit thi yisliya me unka abhar prakat karta houn,jai uttrakhand jai bharat

    harish pathak dewal chamoli.

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  4. गढ़वाली और पहाड़ी भजन की लिस्ट

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