प्रस्तुत है श्री भाष्कर जोशी जी की कुमाऊँनी कविता "ढुंगम धरि है"। इस कविता में जोशी जी ने पहाड़ से पलायन कर बाहर चले जाने के बाद पहाड़ सामाजिक स्थिति प्रस्तुत किया है। साथ ही पलायन कर बाहर गए लोगो के जीवन शैली के बदलावो को भी रेखांकित किया है।
**ढुंगम् धरि है**
रचनाकार: भास्कर जोशी
पाखक् की धुरि हरैगे
गौं-गाड़क शान हरैगे
मेंसू गणी चुडि फुड्याट मचि रै
पहाड़गणी ढुंगम् धरि है।
च्याल-ब्वारिय शहर नहा गयीं
खेति-पतियों कें बंजर धर गयीं
फोनम् बटिया सेटलमेंट कर जाणेईं
सास-सौरुंकणी ढुंगम् धर जाणेईं।
शहरिया छौ-भूत पुजे, पहाड़ उणेईं
शराब, मुर्गा, बाकर भाषोडि जाणेईं
द्यप्तां दगड कॉन्फ्रेंस में बात है जाणेईं
सभ्यता, संस्कृति गणी ढुंगम् धर जाणेईं।
पहाड़ियो! पहाड़ मेजी गाव्-गाव् ऐरेछो
हड़िया कुकुरगणी मारि हैछो
चोर-मुशोर स्वकार है गयीं
रइ-सइ मैंसु मुनव ढुंगम् धर जाणेईं।
आजकलक ब्वारिया प्वल्ट नी लगुन कुंरेई
डबल भेजो बौली लगौंनु कौरेई
ब्या करबटि नखार स्वर्ग चढ़ गयीं
ईज-बौज्यु दुडाट पाडि बेर ढुंगम् धरि गेईं।
बखता य कस ज़मान ऐगो
सर परिवार छोड़ नान एकलु हैगो
सैणिक पछिल चक्कर काटणे में रैगो
ईज-बौज्यु कैं एक्लै छोड़ मरणे लिजी ढुंगम् छोड़ी ऐगो।
गौं-गाड़क शान हरैगे
मेंसू गणी चुडि फुड्याट मचि रै
पहाड़गणी ढुंगम् धरि है।
च्याल-ब्वारिय शहर नहा गयीं
खेति-पतियों कें बंजर धर गयीं
फोनम् बटिया सेटलमेंट कर जाणेईं
सास-सौरुंकणी ढुंगम् धर जाणेईं।
शहरिया छौ-भूत पुजे, पहाड़ उणेईं
शराब, मुर्गा, बाकर भाषोडि जाणेईं
द्यप्तां दगड कॉन्फ्रेंस में बात है जाणेईं
सभ्यता, संस्कृति गणी ढुंगम् धर जाणेईं।
पहाड़ियो! पहाड़ मेजी गाव्-गाव् ऐरेछो
हड़िया कुकुरगणी मारि हैछो
चोर-मुशोर स्वकार है गयीं
रइ-सइ मैंसु मुनव ढुंगम् धर जाणेईं।
आजकलक ब्वारिया प्वल्ट नी लगुन कुंरेई
डबल भेजो बौली लगौंनु कौरेई
ब्या करबटि नखार स्वर्ग चढ़ गयीं
ईज-बौज्यु दुडाट पाडि बेर ढुंगम् धरि गेईं।
बखता य कस ज़मान ऐगो
सर परिवार छोड़ नान एकलु हैगो
सैणिक पछिल चक्कर काटणे में रैगो
ईज-बौज्यु कैं एक्लै छोड़ मरणे लिजी ढुंगम् छोड़ी ऐगो।
भाष्कर जोशी जी की कविता की ऑडियो उनके ही स्वर में सुनिए:
पं. भास्कर जोशी

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