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बैसी में ल्हे बद्यल


बिरखांत – 167: बैसी में ल्हे बद्यल

लेखक: पूरन चन्द्र काण्डपाल

बैसि क बार में एक दुसर गौं कि एक दुसरी कहानि छ।  यां बैसि देखूं हूँ रोजाना द्वि ज्वान लौंड, हरकू- खड़कू औंछीं | यूं आपस में एक दुसरै कि जलंग करछी और एक दुसरै कैं निच्च देखूण कि ताक में रौंछी।  इग्यारी दिन खड़कू धुणी में नाचि गो।  वीक नाचण देखि हरकू लै ताव में ऐ बेर बदन हल्कों फैगो।  खड़कूवै ल हरकू उज्यां आँख ताणी और हरकू लै नाचण फैगो।  खड़कू नाचन- नाचनै हरकूवै क नजीक गो और उकें द्वि मुक्क ज्येड़ि दीं।  हरकू कैं लै गुस्स आ और वील खड़कू कैं मुक्क मारण चा।  यतु में दास ल जोरल आवाज लगै दी, “होश से, बिना गुरु अन्यार रात क्येलै है रै?”  यतुमें हरकूवै ल खड़कू कैं छोड़ि दे।| 

दुसार दिन बैसि कि जागर में हरकू धोति पैरि बेर घरै बै नाचण क मूड में आछ।   उकें धुणी में खड़कू नजर नि आय।  जब खड़कू कैं पत् चलौ कि हरकू धोति पैरि बेर ऐ रौ, उ लै फटाफट धोति पैरि बेर चढ़मड़ानै धुणी में पुजि गो।  जस्सै दास ल ढोल में पट्टाक मारौ, हरकू जोरैल नाचौ और उपन जस तिड़ी बेर खड़कू पर झपटि पड़ौ।  द्विनू कि गुर्दाफानी कैं बैसि क मुंड लै चाइए रै गाय और उनर दयाप्त लै घेरी गोय।  खड़कू-हरकू लड़न–लड़नै धुणी है भ्यार न्है गाय।  दास ल गाव में बै ढोल निकाइ  दे।  कतु झणीयांल उनुकें अछुड़ा पर आखिर में पटवारी बलूण पड़ौ।  आदू रात कै पटवारी क सामणी पंचनाम करि बेर केश रफादफा करौ।  बाईस दिन बाद भनार हौछ पर हरकू–खड़कूव क मनमुटाव ख़तम नि हौय और आज तक लै मुखबलौ न्हैति।  आब यूं नाचण लै भुलि गईं।  झाणी कथां गो उनर दयाप्त घ्वड़ कैं छोड़ि बेर।



बैसि करी डंगरियाँ कि मांग यां ज्यादै छ।  सौ में एकाद कैं छोड़ि बेर सब डंगरिय शिकार, शराब, बीड़ी, सिगरट, तमाकु, खैनी, अत्तर, गांज आदि क सेवन करनी।  इनर आचार, विचार और व्यवहार लै रूढ़िवाद और संकीर्णता ल भरी हुंछ।  लोगों कैं इनर यूं चीजों क सेवन करण में नक् लै नि लागन और न यैकैं यूं ऐब मानन।  पहाड़ बै नौकरी कि ढूंढ में भ्यार आई लोग जब लै पहाड़ जानी, इनार यूं हरकतों देखि चुप रौनी।  क्वे लै गिच नि खोलन।  बुरि चीज हूं बुरि छ कूण कि हिम्मत वां जाते ही लापता है जींछ।

काश! हमार देवभूमि क लोगों कैं य बात समझ ऐ जानि कि य बैसि, जागर, डंगरी, दास, भूत, मसाण हमार दिमाग में छाई अन्यार कि उपज छ, तो लोगों क अन्धविश्वास है बेर पिंड छुटि जान।  यांक स्यैणी विरोध क नाम पर गिच लै नि खोलि सकन।  पढी-लेखी स्यैणी लै चुप रौनी। जब सबूंल चुपै रौण सिखि हैछ त देवभूमि क भल कसिक है सकूं?  अन्धविश्वास क अन्यार कैं भजाउण क लिजी एक नै एक  दिन त एक छिलुक जगूण पड़ल।  कुव क मिनुक बनि बेर ज्यौन राण हैबेर बेबखत कि मौत भलि छ। 

बैसि क बार में यूं द्वि बिरखांतों-166 और 167 पर मंथन जरूरी छ।  म्यर विचार पर जो सहमत न्हैति ऊँ नक झन मानिया।  शराबि दास-डंगरियों क अणगणत किस्स राज्य में फुफै रईं।  हमूल राम ज्यू और कृष्ण ज्यू क दिखाई बाट छोडि बेर आपूं कैं अन्धविश्वास कि स्येलि पर बादि रौछ।  हाम छन अखां काण बनि गोयूं।  म्यार बात पर विश्वास करण कि लै जरवत न्हैति।  खुद परखिया, देखिया पै आपण जज आफी बनि बेर सही  फैसाल करिया | साधुवाद।  अघिल बिरखांत में कुछ और .....

 पूरन चन्द्र काण्डपाल  14.07.2017
प्रसिद्द कुमाउँनी साहित्यकार श्री पूरन चन्द्र काण्डपाल के ब्लॉग से साभार
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