कुमाऊँ का प्रसिद्ध मेला-स्याल्दे बिखौती कौतिक, द्वाराहाट

कुमाऊँ का प्रसिद्ध स्याल्दे-बिखौती कौतिक द्वाराहाट, syalde Bikhauti Kautik, Dwarahat, Kumaon ka Syalde Bikhauti mela

स्याल्दे-बिखौती कौतिक द्वाराहाट, कुमाऊँ का प्रसिद्ध मेला


उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में स्याल्दे बिखौती मेला एक प्रमुख सांस्कृतिक आयोजन है। अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट कस्बे में सम्पन्न होने वाला स्याल्दे बिखौती का प्रसिद्ध मेला प्रतिवर्ष भारतीय कलैंडर के वैशाख माह में सम्पन्न होता है।  हिन्दू नव संवत्सर की शुरुआत अर्थात चैत्र माह प्रारम्भ होने के साथ इस मेले की तैयारी की शुरुआत होती है।  मेला चैत्र मास की अन्तिम तिथि से शुरु होता है जो द्वाराहाट के मुख्य बाजार से आठ कि.मी. दूर प्रसिद्ध शिव मंदिर विभाण्डेश्वर में लगता है।  मेले का दूसरा भाग जो वैशाख माह की पहली तिथि से शुरू होता है द्वाराहाट कसबे के मुख्य बाजार में लगता है।  जैसा पहले भी बताया गया है कि मेले की तैयारियाँ गाँव-गाँव में एक महीने पहले से शुरु हो जाती हैं।  क्योंकि यह क्षेत्र का एक बड़ा व मुख्य आयोजन है इसलिए चैत्र की फूलदेई संक्रान्ति से मेले के लिए आवश्यक तैयारियां शुरू हो जाती हैं।   हर गाँव के प्रधान के घर पर मेले में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों जैसे झोड़ों का गायन आदि की तैयारी  प्रारम्भ हो जाती है।

कुमाऊं के अल्मोड़ा जनपद का यह क्षेत्र पालि पछाऊँ के नाम से भी जाना जाता है, यह नाम शायद इसके पश्चिमी भाग तथा पाली क्षेत्र के कारण पड़ा होगा।  पाली पछाऊँ क्षेत्र का यह एक प्रसिद्ध मेला है, इस क्षेत्र के लोग मेले में विशेष रुप से भाग लेते हैं।  विषुवत् संक्रान्ति ही अपभ्रंश रूप से कुमाऊँनी भाषा में बिखौती नाम से जानी जाती है।  इस दिन स्नान का विशेष महत्व  माना जाता है, ऐसी भी मान्यता है कि जो उत्तरायणी पर नहीं नहा सकते, कुम्भ स्नान के लिए नहीं जा सकते उनके लिए इस दिन स्नान करने से विषों का प्रकोप नहीं रहता।

चैत्र मास की अन्तिम रात्रि को विभाण्डेश्वर महादेव मंदिर परिसर में इस क्षेत्र के तीन धड़ों या आलों के लोग एकत्र होते हैं।  धड़ो का तात्पर्य यहाँ गाँवों के समूह से है, जैसे "आल" नामक धड़े में तल्ली मिरई, मल्ली मिरई, विजयपुर, पिनौली, तल्ली मल्लू और किराली नाम के कुल छ: गाँव् आते हैं।   इस धड़े का मुखिया मिरई गाँव का थौकदार हुआ करता है।  "गरख" नामक घड़े में असगौली, कोटिला,  गेवाड़, पैठानी, बसेरा, बूँगा, बेदूली, सलना तथा  सिमलगाँव आदि लगभग चालीस गाँव सम्मिलित हैं।  इस धड़े का मुखिया सलना गाँव का थोकदार हुआ करता है।  "नौज्यूला" नामक तीसरा धड़ा  इड़ा, कांडे,  किरौलफाट, कौंला, छतीना, बमनपुरु,  बिठौली, बिदरपुर, सलालखोला आदि गाँव को मिलकर बना है तथा इनका मुखिया द्वाराघट का होता है।


मेले का पहला दिन बाट्पुजै-मार्ग की पूजा या नानस्याल्दे कहा जाता है।  बाट्पुजै की रस्म का काम प्रतिवर्ष नौज्यूला धड़े वाले ही करते हैं  और वे ही देवी को निमंत्रण भी देते हैं।  विभिन्न गाँवों के लोग टोलियां बनाकर अपने-अपने ध्वज सहित इनमें रास्ते में मिलते जाते हैं।  मेले में आने का मार्ग परम्परागत रुप से निश्चित है, घुप्प अंधेरी रात में ऊँची-ऊँची पर्वतमालाओं से मशालों के सहारे स्थानीय नर्तकों की टोलियाँ इस मेले में भाग लेने के लिए बढ़ती आती है।  स्नान करने के बाद पहले से निर्धारित स्थान पर नर्तकों की टोलियाँ इस मेले को सजीव करने के लिए जुट जाती है।  क्षेत्र के स्थानीय लोग मेले में विशेष रुप बड़े उत्साह से भाग लेते हैं।

मेले की ऐतिहासिकता के बारे में जानना चाहें तो मेले की यह परम्परा कितनी पुरानी है इसका कोई निश्चित इतिहास नहीं है।  बताया जाता है कि शीतला देवी के मंदिर में प्राचीन समय से ही आस-पास के ग्रामवासी आया करते थे तथा देवी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के बाद अपने-अपने गाँवों को वापस लौट जाया करते थे।  इस बारे में जो सर्वाधिक प्रचलित जनश्रुति है वह यह है कि शीतला देवी के मंदिर से लौटने के दौरान एक बार किसी कारण दो गांवों के ग्रामीण दलों में खूनी संघर्ष हो गया।  संघर्ष के दौरान हारे हुए दल के सरदार का सिर खड्ग से काट कर उसे एक स्थान पर गाड़ दिया और जिस स्थान सिर गाड़ा गया, उस स्थान पर स्मृति चिन्ह के रूप में एक पत्थर रख दिया गया।  इस निशान वाले पत्थर को बाद ही अब ‘ओड़ा’ कहा जाता है और तभी से ‘ओड़ा भेटने’ की एक परम्परा बनी।   जिसके अनुसार इस ओड़े पर चोट मार कर आगे बढ़ने को "ओड़ा भेटणा" कहा जाने लगा और ओड़ा भेटने के बाद ही मेले में आगे बढ़ा जा सकता है। 

पहले कभी यह मेला इतना विशाल था कि अपने-अपने दलों के चिन्ह लिए ग्रामवासियों को ओड़ा भेंटने के लिए दिन-दिन भर इन्तजार करना पड़ता था।   सभी दल ढोल-नगाड़े और निषाण से सज्जित होकर आते थे।   रणसिंघ (तुरही) की हुँकार और ढोल पर चोट के साथ हर्षोंल्लास से ही टोलियाँ ओड़ा भेंटने की रस्म अदा करती थीं।  लेकिन बाद में इसके लिए तीनो धड़ो "आल","गरख" और "नौज्यूला" के बीच एक सुव्यवस्थित व्यवस्था तय कर दी गई।  अब इसी व्यवस्था के अंतर्गत तीनो धड़ो के द्वारा सामूहिक रूप से परम्पराओ के अनुसार विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक क्रिया-कलाप संपन्न होते हैं।  ओड़ा भेंटने का काम अपराह्म में शुरु होता है जिसके लिए "गरख" और "नौज्यूला" दल पुराने बाजार में से होकर पहुँचता है ।  जबकि "आल" दल का समूह पुराने बाजार के बीच की एक तंग गली से होता हुआ मेले के वांछित स्थान पर पहुँचता है।  

मेले के दौरान तीनो धड़ो के समूहों की वेशभूषा और सज धज बी आकर्षण का केंद्र  होती है।  विशेष  रूप से लोक नृत्य और लोक संगीत से यह मेला अभी भी सजा संवरा है  जिसमें मेले में भगनौले जैसे पारम्परिक पर लुप्तप्राय लोकगीत भी अजब समां बाँध देते हैं।  मेले के दौरान गांवों से एक खास अंदाज में एक-दूसरे के हाथ थाम और कदम से कदम मिलाते हुए कुमाऊं के प्रसिद्ध लोक नृत्यों झोडे, चांचरी, छपेली आदि का परंपरागत वस्त्रों व अंदाज में लोग आनंद लेते हुए देखे जा सकते हैं।  बाजार में ओड़ा भेंटने की र को देखने और स्थानीय नृत्य को देखने अब पर्यटक भी दूर-दूर से आने लगे हैं। इसके बाद ही मेले का समापन होता है।

कभी यह मेला व्यापार की दृष्टि से भी समृद्ध था तब कुमाऊँ के सभी क्षेत्रों से लोग यहां मेले में खरीदारी और व्यापार करने को आते थे।   यहाँ तक कहा जाता है कि ब्रिटिश शासन काल में तिब्बत के व्यापारी भी यहाँ व्यापार को आते थे।  परन्तु पहाड़ में सड़कों का जाल बिछने से अब मेले का व्यापारिक स्वरुप समाप्त प्राय: है ।   वैसे इस मेले में जलेबी का रसास्वादन करना भी एक परम्परा जैसी बन गयी है जिस कारण मेले में जलेबी की दुकानों की भरमार  और मेले के दिन द्वाराहाट का बाजार जलेबी से भरा रहता है।

प्रसिद्ध कुमाऊँनी गायक स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी जी को याद किये बिना इस मेले का वर्णन पूरा नहीं हो सकता है।  इसी क्षेत्र के मूल निवासी होने के कारण यह मेला उनके दिल में बसा हुआ था तथा गीतों के माध्यम से समय समय पर जीवंत हो उठता था  जाने कितने गीतों में उनके गीतों की नायिका इस मेले में जाने के लिए कभी नाराज़ हो जाती है।  कभी देर कर रही होती है तो कभी वह मेले गम हो जाती है  शायद आपने गोस्वामी की का प्रसिद्ध गीत "अलघते बिखौति मेरि दुर्गा हरै गे......" जरूर सुना होगा

इस मेले की प्रमुख विशेषता है कि पहाड़ के अन्य मेलों से अलग मेले का पारम्परिक स्वरुप अभी भी मौजूद है।  पहाड़ के बदलते आधुनिक परिवेश, पलायन आदि कारणों से पारम्परिक मूल्यों के ह्रास के बावजूद यह मेला आज भी किसी तरह से अपनी पहचान बनाये हुए है।

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