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वत्सनाभ (मीठा विष)


वत्सनाभ (मीठा विष)- Indian Aconite
लेखक: शम्भू नौटियाल

मीठा विष या वत्सनाभ, वानस्पतिक नाम- (एकोनिटम फेरोक्स: Aconitum ferox): उत्तराखंड में कुछ वनस्पतियां मौजूदा दौर में संरक्षण व संव‌र्द्धन के अभाव में संकट में हैं। हिमालय के इर्दगिर्द जीवनदायिनी जड़ी-बूटियां ही नहीं बल्कि कुछ प्राणघातक विष वाली वनस्पतियां भी मौजूद हैं जो कुछ ही क्षण में ही इंसान की जान तक ले सकती हैं।  हिमालय के नजदीक पाए जाने वाले मीठा विष नामक वनस्पति के फूल सूंघने मात्र से इंसान मूर्छित हो सकता है। 



मीठे विष के पौधे समुद्र तल से 10,000 से 15,000 फुट की ऊंचाई तक पाए जाते है। यह Ranunculaceae फैमिली का पौधा है व जुलाई से अगस्त के महीनों में इस पौधे में नीले फूल खिलते हैं। कुछ फूल द्विरंगी भी होते हैं। दिखने में बेहद सुंदर यह पुष्प प्राणघातक हैं। इसके विषैले पौधे के फूलों को सूंघने से ही मनुष्य बेहोश हो जाता है। बछड़े की नाभि के समान इसकी जड़ होने के कारण इसे वत्सनाभ पुकारा जाता है। सबसे ज्यादा विष इसकी जड़ में ही होता है। दो तरह के वत्सनाभ होते है एक काला और दूसरा सफेद। वत्सनाभ का प्राकृतिक रंग पीला धूसर होता है इसकी खास बात होती है कि इसके नजदीक दूसरे पेड़ नही लगते हैं।

प्राचीन आचार्यों ने वत्सनाभ के बारे में कहा है कि –
#सिन्दुवारसदृक्पत्रो वत्स्नाभ्याकृतिस्तथा।
#यत्पार्शेव:न तरोवृद्धि वत्सनाभ: स उच्यते।।
अर्थात जिसके पते निर्गुन्डी के समान हो एवं जड़ की आकृति बछड़े की नाभि के समान दिखाई दे। उसके आसपास और कोई वृक्ष न उगता हो, उसे वत्सनाभ समझना चाहिए।  हिंदी में इसे मीठा विष, बच्छनाभ, विषा, संस्कृत में वत्सनाभ, अंग्रेजी में एकोनिट और लेटिन भाषा में एकोनिटम फेरोक्स के नाम से जानते हैं। इस वनस्पति की घातकता के बारे में उच्च हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रोंमें रहने वाले लोग भी जानते हैं।




यदि पालतू पशु इस वनस्पति के पत्ते, जड़ या तना खा लें तो उसकी तत्काल मौत हो जाती है। इसके फूलों को सूंघने से ही मनुष्य बेहोश हो सकता है। इसमें बड़ी मात्रा में अत्यंत विषैले एल्केलाइड एकोनाइट व स्यूडोएकोनाइटिन पाया जाता है। यह दुनिया के जहरीले पौधों में होता है। सेवन के पश विषाक्तता के लक्षण आमतौर पर 45 मिनट से एक घंटे बाद तक दिखाई देते हैं और इसमें मुंह और गले का सुन्न होना और उल्टी होना शामिल है। सेवन के कुछ समय पश्चात ही श्वास की गति पहले तेज और फिर मंद होने लगती है और अन्ततः हृदय गति काफी धीमी पड़ जाती है जिससे जीव की मृत्यु हो जाती है। 

इसके बावजूद भी वत्सनाभ का उपयोग आयुर्वेदिक दवा के रूप में किया जाता है। आयुर्वेद में कुच्छ औषध द्रव्य विष वर्ग में आते है। उन्ही में से वत्सनाभ एक प्रमुख औषध द्रव्य है। यह अतिविषैला होता है, इसकी जड़, पते एवं फूल सभी में विष उपस्थित रहता है। फूलों को सूंघने से मूर्च्छा आने लगती है। अगर इस औषध द्रव्य का सेवन बिना शौधित किये कर लिया जाए तो व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है।



इतना जहरीला होने के पश्चात भी इसे व्यर्थ न समझना चाहिए। क्योंकि आयुर्वेद चिकित्सा में शौधित या विधि पूर्वक शुद्ध किए वत्सनाभ का उपयोग विभिन्न रोगों जैसे- बुखार, सूजन, दर्द एवं प्रमेह आदि में प्रयोग करवाया जाता है। शौधन करने के तदोपरान्त व वैद्य के अनुसार ग्रहण किया जाए तो अति लाभकारी सिद्ध होता है। खांसी और बुखार में वत्सनाभ को पीसकर गले के बाहर लेप करने से आराम मिलता है। 70 ग्राम अखरोट में 10 ग्राम शुद्ध किया वत्सनाभ मिलाकर उसमें से एक ग्राम की मात्रा तीन दिनों तक रोगी को देने से मधुमेह और पक्षाघात में लाभ मिलता है। वत्सनाभ का तेल सभी प्रकार के दर्द में लाभकारी है। यह गठिया और सूजन को कम करने में विशेष उपयोगी होता है। बिच्छू के काटे स्थान पर इसे पीसकर लेप करने से लाभ मिलता है।

नोट: वत्सनाभ के अत्यधिक सेवन से मनुष्य की मृत्यु भी हो सकती है। इसलिए इसका प्रयोग हेतु आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरूर लें।


 

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