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विलुप्त हूणैइं ईजाएं

कुमाऊँनी कविता-विलुप्त हूणैइं ईजाएं, Kumaoni bhasha mein Kavita vilupt hoti ijaein

विलुप्त हूणैइं ईजाएं

रचनाकार: डी.पी. तिवारी

ईजाएं अब विलुप्त हुण लाग गयीं
पहाड़नैकि यो उन्नत प्रजाति
अब प्रायः अलोप हुण लाग रयिं
ईजाएं अब अलोप हुण लाग रयिं

कपाव में पिठ्या
सुल्ट पल्लैकि धोती
गाल में चर्रयो
हाथन में चुड़ी
कानन में कनफूल
ठुमठम घरभर में दौडनी
यस ईज अब कम हुण लाग रयिं
ईजा अब अलोप हुण लाग रयिं

सूरज निकलण हैबेर पैंली
खुद उठ जानीं
जप तप करबेर
द्द्याप्तन कें जगूणि
शेई घर में वीक
भजन-धुन गूंजणि
सूरज कें अर्घ्य चढै
रत्तै तुलसी पूजणि
यस ईज अब कम हुणैयिं
ईजा अब विलुप्त हुणैयिं

हर त्यार
तनमनैल मनूणी
पील काकोड़ोक रैत
बड़-पू-पूड़ी बणुणी
दीवालिन में
कचौड़ी सिंगलैकि बारि लगूणि
नान्तिनन कें कोच्यै-कोच्यै बेर खवूणि 

एक-एक रस्मौक
ख्याल रखणि
जी-रयै बची-रयै
हर्रयाल-च्यूड़ लगुणि
यस मै अब कम हुणैयिं
यस ईज अब विलुप्त हुणयिं


ऐकादिशी पुन्यु
पैंल-नौर्त और नौमी
जब लै देखौ
ऊ ब्रत मेंई हुनी
खुदाक लिजी
के सोचनै न्हैन ऊ
पुर घराक लिजी
दिन भर भुखी रूँ
भगवान् और घराक बीच
ऊ एक कड़ी बणि रुँ
खुश रौ पुर घर
हर यसी जुगत लगूणि
यस मै अब कम हुण लागरयिं
ईजा अब विलुप्त हुण लाग रयिं

आलूक थेच्यू
फराशबीन पकुणी
पिनालुक साग
कुणकुणान गाब बणुणि
“द्वि दिनाक लिजी
नान्तिन घर में ऊणि”
सार दुनियैकी चीज
ऊ चाँ खऊँण
ममताकि यस मूरत अब गुम हुण लाग रयिं
यसि मै अब कम हुण लाग रयिं
ईजा अब विलुप्त हुण लाग रयिं
ईजा अब विलुप्त हुण लाग रयिं

कुमाऊँनी रूपांतरण✍🏽डीपी तिवारी
(कैकै औरौक मैटर संशोधित और कुमाउँनी में अनूदित)
 
फेसबुक ग्रुप Myar Kumaon से साभार
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