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काठगोदाम रेल स्टेशन


काठगोदाम रेल स्टेशन
(रचनाकार: उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम")

दूर पर्वतै कि छायाकृति, देख बेर उठछी उमंग।
लालकुं रेल जब पुज जांछी, इज बौज्यू हुंछी संग।
इज बौज्यू हुंछी संग, अपलक हम पहाड़ उज्यांणिं चांछी।
लालकुं स्टेशनाक मशहूर, चहा समोसा और जलेबी खांछी।
लालकुं बटि शुरु हुंछी उकाव, इंजन करण लागछी फूं फूं।
उ इंजनाक दगड़ एक और इंजन, उंछी रेल में धक्क लगूंहूं।

रेलैकि खटखट फटफट दगड़, काठगोदाम जब ऐ जांछी पास।
मन में मणी मणी घुल जांछी, पहाड़क लागि निश्वाश।
पहाड़क छायी निश्वास, पहाड़ कुं अंगवाव जै दिछु।
मन हुंछी अब दौड़ बेर, पहाड़नै कि बोकि जै ली ल्यूं।
अब मैं तुमुंकू बतूंनू, य सारि दुनि में हमार पहाड़क मान डूं।
य छू काठगोदाम रेल स्टेशन, जो हमर पहाडैकि शान छू।

रेल पहाड़ानाक तलि पुज बेर, लागछी करनै दण्डवत प्रणाम।
हम लै उतर बेर प्लेटफारम में, कूछी जै भोलेनाथ सियाराम।
जै भोलेनाथ सिया राम, म्यर तो मन तब जै य कूछी।
रेल काठगोदाम में पुजै बेर, पहाड़नाक दगड़ मिलूंछी।
छु सुंदर काठगोदाम स्टेशन, हमर पहाडैकि जीवन धारा।
सदियों बटि यैल पहाड़ और मैदानक, बणांई भै भाईचारा।


जै जै हमार पहाड़! जै जै उत्तरांचल!
उमेश त्रिपाठी (काका गुमनाम द्वारा रचित एंव प्रसारित
उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" २७-१२-१७
श्री उमेश चंद्र त्रिपाठी "काका गुमनाम" जी की फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी शब्द सम्पदा पोस्ट से साभार

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