
रूद्रवंती या रुदंती(Littoralbind weed)
लेखक: शम्भू नौटियालरूद्रवन्ती या रूदन्ती; वानस्पतिक नाम: ऐस्ट्रागैलस कैन्डोलेनस (Astragalus candolleanus Royle ex Benth.) पादप कुल फैबेसी (Fabaceae) से संबंधित है। इसका अंग्रेजी नाम लिट्टोरल बिन्ड वीड (Littoralbind weed) है तथा संस्कृत में इसे दन्तिका, रुद्रवन्ती, रूदन्ती कहते हैं। यह वनस्पति समुद्रतल से 2700-4500 मीटर की ऊंचाई पर पायी जाती है। इसमें पुष्प पीले व पुष्पन मई से अगस्त तक होता है। सर्वप्रथम इसका प्रयोग शांग्रधर संहिता में मिलता है। इस संहिता में इसे रसायन कहा गया है।
रुद्रवन्ती की वास्तविक प्रजाति के बारे में सूचना विवादास्पद है। या भी कह सकते है कि रुदन्ती के सन्दर्भ में कई मतभेद है। हिंदी में रुद्रवंती या रुदंती कही जाने वाली 3 जड़ी बूटियाँ है। 1-Astragalus candoleanus, 2-Cressa cretica तथा Capparis moonii हालांकि इन तीनों के औषिधीय गुण कर्म और औषिधीय प्रयोग एवं लाभ में लगभग समानता है और यह सब उष्ण वीर्य है। लेकिन कुछ लोग Astragalus candolleanus Royle ex Benth. तथा कई लोग Cresa cratica (दुर्लभ) को रूदन्ती मानते हैं। रूदन्ती भारत के हिमालयी उच्च स्तरीय कुछ क्षेत्रों में प्राप्त होती है। इसका क्षुप चने के जैसा होता है।

रूदन्ती के संदर्भ में अनेक अवधारणाएं प्रचलन में है प्राचीनकाल में कीमियागिरी व अन्य प्रयोगों के लिए भी रूदन्ती के उपयोग का वर्णन आता है। आयुर्वेद के विशेषज्ञों ने अन्वेषण के आधार पल रूद्रवन्ती की प्रमुखतः दो प्रजातियां Astragalus candolleanusRoyle ex Benth. तथा Cresa cratica हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है व औषधीय गुणों के कारण बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हिमालय में रहने वाले लोग अनेक व्याधियों के शमन के लिए इन्हीं रूदन्ती का प्रयोग करते हैं। Astragalus candolleanus Royle ex Benth.-छोटा, शाखा-प्रशाखाओं से युक्त जमीन पर फैला हुआ क्षुप होता है। इसके पत्र चने के जैसे हरे रंग के तथा रोमश होते हैं।
इसके पुष्प पीत वर्ण के तथा छोटे होते हैं। जबकि Cresa cratica Linn. का क्षुप सीधा, छोटा तथा शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होता है। इसके पत्र 6-8 मिमी लम्बे, चने के जैसे, अग्रभाग पर नुकीले तथा रोमश होते हैं। इसके पुष्प श्वेत वर्ण के होते हैं। रुदन्ती कटु, तिक्त, उष्ण तथा कफपित्तशामक, रसायन, अग्निदीपन, वीर्यवर्धक तथा वृष्य होती है। यह रक्तपित्त, श्वास, क्षय, कृमि, प्रमेह, विष, शोष, शूल, आध्मान, अपस्मार तथा गुल्म शामक होती है। इसमें पूतिरोधी एवं क्षयरोधी गुण पाए गए हैं। इसके पुष्प कोशिकाविषी एवं शोथहर क्रियाशीलता प्रदर्शित करते हैं। यह रक्त शोधक, क्षय रोग नाशक तथा पूयरोधी है।

रूदन्ती पञ्चांग, मुलेठी तथा तुलसी से निर्मित क्वाथ को पीने से पुरानी खाँसी, कफ व श्वास रोगों में अत्यन्त लाभ होता है। उदर विकार में रुदन्ती पत्र चूर्ण का सेवन करने से अग्निमांद्य, क्षुधानाश, आनाह, उदरशूल तथा उदरकृमि का शमन होता है। मिलाकर सेवन करने से उदरकृमियों का शमन होता है। रुदन्ती चूर्ण को चावल के धोवन के साथ सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है। रूदन्ती पञ्चांग को 1 गिलास पानी में रात्रिभर भिगोकर रखकर प्रातः इसे मसल-छानकर पीने से मधुमेह में अत्यन्त लाभ होता है। रुदन्ती चूर्ण में काली मिर्च चूर्ण मिलाकर सेवन करने से रक्त का शोधन होता है। रूदन्ती पञ्चाङ का क्वाथ बनाकर पीने से ज्वर का शमन होता है।

(यह भी एक आश्चर्यजनक व शोध का विषय है कि हिमालय में पाया जाने वाला यह दुर्लभ औषधीय वनस्पति रुद्रवंती दो रूप में यूपी के फतेहपुर में खागा तहसील के मंक्षिलगांव में भी मिलता है।)
शम्भू नौटियाल
श्री शम्भू नौटियाल जी के फेसबुक पोस्ट से साभार
श्री शम्भू नौटियाल जी के फेसबुक प्रोफाइल पर जायें
0 टिप्पणियाँ