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उचमुचाट

कुमाऊँनी कविता, विकास'ल कौछ, आब मि कभणिं ऊण छ, पैलिक तुमार कुड़िम, या गौं मजि्?  पदान ज्यु'ल कौछ, ठैर रे! Kumauni Poem about corruption in village polytics

उचमुचाट
रचनाकार: घनश्याम अण्डोला

विकास'ल 
कौछ,
आब मि कभणिं ऊण छ,
पैलिक तुमार कुड़िम,
या गौं मजि्?

पदान ज्यु'ल कौछ, ठैर रे!

पैंली हिसाब तो लगूंन दे,
कमर त बिसौंन दे,
कुखुड़ा-राक्सी हिसाब लगूंन दे,
नकद-उधार'क अंताज करन् दे,
खालि औतछै तू,
जगरी मि छौं के तू।

जसिक गढ़ूंल,
जसिक नचौंल,
त्वेकैं नाचन छ,
डंगरी छै, नाच करलै,
मि त घन्याई छूं,
म्यार पछिल भगार छैं
सौकार-स्यौनाई ले मि छूं,
मि ल्हिभे तू, तू ल्हिभे गौं।।

©घनश्याम अण्डोला, दि• २५-१०-१९

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