
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
उज्याव
चाँछै
छिलुक
बण ।
........
फूल लगौ
कटकी रौ
दैल - फैल
आफि है जालि ।
.............
हमारन वां
मूँख ....
तुम जस
छार फोकी
और अन्यार ले
हुँछ बल ....
म्योर
निचोड़ी रयी छ
तुमौर मूँख ...
आर्सी में देखिया ।
..............
म्योर
मूँख
" तुम " जस
छ ।
..........
उ
राखी ल्ही बेरि ऐ
मूँ
सटिक गियूँ ।
😂😂😂😂
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बाँध
बणन लागि रौ बल
पंचेश्वर में ....
पाँणिं कैं
झेल हालणै तैयारी है रै
आमुँणिं- सामुणिं
ठाड़ है रयी
ज्वान पहाड़ 'क् खुटन में
ज्यौड़
बादी जनेर छ .....
यों कती भाजौ न कै बेरि
और चौकिदार'न जास
ठड़ी रौऔं ....
पहाड़'क गाव जाँणै
कंक्रीट ठोसी जनेर छ
वी बाद ....
गोरी , काली , रामगंग
पनार , रौड़ , गध्यार
सबनैकि खाप मुँदी जालि
झेल में ......
मनखीकी न्याँत
" भ्यार " जाँणै लिजी
ताव् - तावै
बाट बणैंयी जनेर छ
जाँ बटी
पाँणि भाजौल
और बिजुलि बणैंलि बल
मगर .....
हमार गौं
खेत , जंगल
कुड़ि , बखायि और
मैंसनैकि लिजी
जिन्दगी भरी कैद भै
आब्
उज्याव ले
कसिक होल कै हरौछा
पाँणि में .....
है ले जालो त
के फैद
हमन कैं ....
गदध्यार, लि
साफ बतै है।
शब्दार्थ:
दैल फैल - धन धान्य,
कटकी रौ - चुप रहो,
सटिक - भागना,
आर्सी - सीसा
ज्यौड़ - रस्सी,
ठोसी - भरना,
मुँदी - बंद करना,
भ्यार - शंका समाधन के संदर्भ में है ।
ताल तावे - नीचे नीचे,
बाट - सुरंग
August07, 09 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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