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गदू, गदुवा या कद्दू (Pumpkin)


गदू, गदुवा या कद्दू (Pumpkin)
लेखक: शम्भू नौटियाल

कद्दू शब्द का प्रयोग व्यंग्यात्मक रूप में किया जाता हो लेकिन कद्दू को देखकर मुंह बनाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह बहुत ही काम की सब्जी है और 'व्यंजनात्मक' रूप में इसका प्रयोग ज्यादा अच्छा है। यह सब्जी जितनी लोगों को बेस्वाद लगती हैं उतने ही इसमें पोषक तत्व भी पाए जाते हैं जो दूसरी किसी सब्जी में नहीं मिलते। कद्दू सुनते ही हंसी आ जाती है। अकसर मोटे लोगों का मज़ाक उड़ाने के लिए और छोटे बच्चों को प्यार से हम कद्दू कह देते हैं। इसे काशीफल भी कहा जाता है। कद्दू का अंग्रेज़ी नाम पम्पकिन, राउन्ड गॉर्ड है और कद्दू का वानस्पतिक नाम कुकरबिटा मोस्चाटा (Cucurbita moschata) है।


कद्दू का फल आकार में बड़ा होता है और यह 6 महीने तक खराब नहीं होता है। अत: 6 महीनों तक इसका उपयोग सब्जी या अन्य रूपों में करते हैं। कद्दू की बेल (लता) होती है। सर्दियों में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में छज्जों व छतों पर रखे हुऐ पीले व लाल कददू अक्सर शिवरात्रि आने तक दिखाई देते है। दरअसल छत पर ही इन पके हुए कद्दुओं का लम्बे समय तक भंडारण संभव है। हालांकि आज गाँवों तक बन्दरों की पहुँच से अब यह नजारा आम नहीं रह चुका है, लेकिन जिन इलाकों में बन्दरों का आतंक नहीं है ये आज भी छत की शोभा बढ़ाते दिख ही जायेंगे। छत पर रखने से वक्त जरूरत इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। 

कद्दू को कुमाऊँनी में गदू या गदुवा और गढ़वाली में कहीं लोंकूड़ू तो कहीं खीरा कहते हैं।  कद्दू भारत में सोलहवीं सदी के समय या सत्रहवीं सदी में ही आया। विभिन्न तरीकों से सबको लुभाने वाला कद्दू अंटार्कटिका के अलावा दूसरे सभी महाद्वीपों में पाया जाता है। इसका का मूल स्थान दक्षिण अमेरिका का मैक्सिको क्षेत्र है। कद्दू स्पेनी अन्वेषकों द्वारा गल्फ व वेस्ट इंडीज के समुद्री किनारे पंहुचा व एशिया से 1688 में यूरोप पंहुचा। भारत में कद्दू शायद गल्फ देशों से सत्रहवीं सदी में ही पंहुचा और धीरे धीरे अठारवीं सदी में कद्दू का प्रसार हुआ।

उन्नीसवीं सदी के प्रथम वर्षों या अठारवीं सदी के अंत में कद्दू ने उत्तराखंड में प्रवेश पाया होगा और अंग्रेजी शासन समय में ही कद्दू का प्रसार उत्तराखंड में तेजी से हुआ होगा। कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी कद्दू में केरोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। बीटा केरोटीन एंटीऑक्सीडेंट होता है जो शरीर में फ्री रैडिकल से निपटने में मदद करता है। कद्दू ठंडक पहुंचाने वाला होता है। इसे डंठल की ओर से काटकर तलवों पर रगड़ने से शरीर की गर्मी खत्म होती है।

कद्दू के बीज भी बहुत गुणकारी होते हैं। कद्दू व इसके बीज विटामिन सी और ई, आयरन, कैलशियम मैग्नीशियम, फॉसफोरस, पोटैशियम, जिंक, प्रोटीन और फाइबर आदि के भी अच्छे स्रोत होते हैं। यह बलवर्धक, रक्त एवं पेट साफ करता है, पित्त व वायु विकार दूर करता है और मस्तिष्क के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। प्रयोगों में पाया गया है कि कद्दू के छिलके में भी एंटीबैक्टीरिया तत्व होता है जो संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं से रक्षा करता है। शायद इन्हीं खूबियों की वजह से कद्दू को प्राचीन काल से ही गुणों की खान माना जाता रहा है।

 

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