चैती मेला - काशीपुर

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चैती मेला - काशीपुर


चैती का मेला कुमाऊँ क्षेत्र का प्रसिद्ध मेला है जो उधमसिंह नगर जनपद के काशीपुर नगर के पास प्रतिवर्ष चैत की नवरात्रि में आयोजित किया जाता है।  इस स्थान का इतिहास बहुत पुराना बताया जाता है।  काशीपुर में कुँडश्वरी मार्ग जहाँ से जाता है, वह स्थान महाभारत से भी सम्बन्धित रहा है।  इस स्थान पर अब बालासुन्दरी देवी का मन्दिर है। मेले के अवसर पर यहाँ श्रद्धालु दूर-दूर के स्थानों से आते हैं।

शाक्त सम्प्रदाय से सम्बन्धित देश के सभी मंदिरों में नवरात्रि में विशाल मेले लगते हैं लेकिन माँ बालासुन्दरी के विषय में जनविश्वास है कि इन दिनों जो भी मनौती माँगी जाती है, वह अवश्य पूरी होती है।  विशेष रूप से नवरात्रि में अष्टमी, नवमी व दशमी के दिन यहाँ श्रद्धालुओं का विशाल समुह ही उमड़ पड़ता है।  बालासुन्दरी देवी के अतिरिक्त यहाँ शिव मंदिर, भगवती ललिता मंदिर, बृजपुर वाली देवी के मंदिर, भैरव व काली के मंदिर भी स्थित हैं।  

वैसे माँ बालासुन्दरी का स्थाई मंदिर पक्काकोट मुहल्ले में अग्निहोत्री ब्राह्मणों के यहाँ स्थित है।  इन लोगों को चंदराजाओं से यह भूमि दान में प्राप्त हुई थी।  बाद में इस भूमि पर बालासुन्दरी देवी का मन्दिर स्थापित किया गया। मन्दिर में स्थित बालासुन्दरी देवी की प्रतिमा स्वर्णनिर्मित बताई जाती है।  कहा जाता है कि आज जो लोग इस मन्दिर के पंडे है, उनके पूर्वज मुगलों के समय में यहाँ आये थे।  उन्होंने ही इस स्थान पर माँ बालासुन्दरी के मन्दिर की स्थापना की।  यह भी कहा जाता है कि तत्कालीन मुगल बादशाह ने भी इस मंदिर को बनाने में सहायता दी थी।

नवरात्रियों में यहाँ विभिन्न स्थानों से आये व्यापारी तरह-तरह की दूकानें अपना सामान बेचने के लिए लगाते हैं।  स्थानीय थारु जनजाति के लोगों की तो देवी पर बहुत ज्यादा आस्था है।  थारुओं के नवविवाहित जोड़े हर हाल में माँ से आशीर्वाद लेने यहां चैती मेले में जरुर पहुँचते हैं।  देवी महाकाली के मंदिर में बलिदान भी होते हैं।  अन्त में दशमी की रात्रि को माँ बालासुन्दरी देवी की डोली में सवारी अपने स्थाई भवन काशीपुर के लिए प्रस्थान करती है।  मेले का समापन डोली में देवी माँ की सवारी के बाद ही होता है।

चैती मेला तभी से अपने पूरे रंग में आना शुरु होता है जब काशीपुर से माँ का डोला चैती मेला स्थान पर पहुँचता है।  डोले में प्रतिमा को रखने से पूर्व अर्धरात्रि में पूजन होता है तथा बकरों का बलिदान भी किया जाता है।  डोले को स्थान-स्थान पर श्रद्धालु रोककर देवी का पूजन-अर्चन करते हैं और माँ भगवती को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। 

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